Tuesday, June 16, 2020

इंटरनेट की स्पीड चेक कैसे करे

इंटरनेट की स्पीड 




इंटरनेट की स्पीड को टेस्ट करने का आसान तरीका 
इस तरह इंटरनेट की स्पीड टेस्ट करें
भारत में इन्टरनेट युजर्स को काफी स्लो इन्टरनेट स्पीड का सामना करना पड़ता है जिससे उनका काम सही ड़ग से नही हो पाता 
लैपटॉप हो या स्मार्टफोन सब  इंटरनेट के बिना फीके है. इंटरनेट है तो आप दुनिया भर कि बहुत कुछ चीजें  डाउनलोड कर सकते हैं. ऑनलाइन फिल्में देख सकते हैं या सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर सकते हैं. हालांकि यह बताने की जरुरत नहीं कि यूजर्स इंटरनेट से क्या कर सकते हैं. युजर्स इन्टरनेट से बहुत कुछ कर सकता है
आज में आपको इन्टरनेट की स्पीड चेक करने का एक असान तरीका आपको बताने जा रहा हूँ जिस से आप लेपटॉप या मोबाइल कि स्पीड असानी से चेक कर सकते हो 
आज के समय में इंटरनेट का इतना ज्यादा उपयोग होता है ना शायद ही पहले हुआ हो और आने वाले समय में इंटरनेट का यूज काफी तेजी से बढेगा
आज के समय में भारत में फोर जी नेटवर्क का उपयोग हो रहा है



भारत में इंटरनेट का स्लो होना सबसे बड़ी समस्या है. चाहे मोबाइल, इंटरनेट या ब्रॉडबैंड यूजर्स इस बात को लेकर परेशान रहते हैं कि इंटरनेट की स्पीड क्या है. कई बार कंपनियां दावा तो ज्यादा स्पीड का करती हैं लेकिन जब एक वीडियो देखना चाहें तो आराम से देख भी नहीं सकते. जब आप टेलीकॉम या इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को कॉल करेंगे तो उधर से बताया जाएगा कि उन्होंने जितने स्पीड का दावा किया था वही मिल रही है.

हम आपको इंटरनेट स्पीड टेस्ट करने का सबसे आसान तरीका बताते हैं. इसके जरिए आप यह पता लगा सकते हैं कि कंपनी ने जितने स्पीड का कमिटमेंट किया है उतना दे रही है या नहीं. आप इसके जरिए कंपनियों को स्पीड कम देने का चैलेंज भी कर सकते हैं.

  • fast.com : यह शायद दुनिया का सबसे आसान इन्टरनेट स्पीड टेस्ट मोनिटर वेबसाइट है. हाल ही में वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी नेटफ्लिक्स ने इसे ग्लोबल लॉन्च किया है. आपको इंटरनेट ब्राउजर में www.fast.co लिखना है. वेबसाइट ओपन होते ही स्पीड टेस्ट शुरू हो जाएगा आपको किसी खास ऑप्शन पर क्लिक करने की  जरूरत नहीं होगी.

इस वेबसाइट का यूजर इंटरफेस काफी आसान है. चंद सेकेंड्स में आपको इन्टरनेट स्पीड बता दी जाती है  यहां आपको एक ऑप्शन मिलेगा जिसके जरिए इन्टरनेट स्पीड को Speetest.net की स्पीड से कंपेयर भी कर सकते हैं. इसकी खासियत यह है कि इसमें आपको विज्ञापन कही भी नजर नही आऐगे

  • Speedtest.net : यह वेबसाइट दुनिया की चंद मशहूर इंटरनेट स्पीड टेस्ट वेबसाइट्स में से एक है. इसका यूजर इंटरफेस काफी दिलचस्प और बढीया है. इसमें इंटरनेट की डाउनलोडिंग और अपलोडिंग स्पीड के साथ पिंग भी पता चलता है.

Monday, June 15, 2020

एम.एस.वर्ड और उसकी विशेषताएं

एम.एस.वर्ड
माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सिस्टम को इनस्टॉल तथा एक्टिव करने के पश्चात जब आप पहली बार एम.एस.वर्ड चलाते है तो वर्ड कुछ बेसिक सेटिंग्स आपसे पूछता है और आपके अनुसार सेट कर देता है । वर्ड में सभी निर्देश तथा जानकारी यूजर इंटरफ़ेस के माध्यम से दी गई होती है । अधिकाँश निर्देश वर्ड में मुख्य रिबन पर दिए होते है जो वर्ड में ऊपर की तरफ विस्तृत क्षेत्र होता है । रिब्बन में सभी मुख्य कमांड्स आइकॉन की मदद से दिए होते है ताकि सिर्फ एक क्लिक करके आप उनका किसी भी समय उपयोग कर सकते है ।

माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के सभी सॉफ्टवेयर में यह रिब्बन होता है तथा इस रिब्बन के तीन मुख्य भाग है
1. Tab (टैब) - टैब के अंदर साथ मुख्य ऑप्शन है, इनमे से प्रत्येक एक महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है| इनके माध्यम से वर्ड में हर चीज़ कंट्रोल की जा सकती है ।
2. ग्रुप - यह सम्बंधित आइटम्स को एक साथ ग्रुप में दिखाता है ।
3. कमेंट - इसमें कोई भी टिपण्णी तथा जानकारी रखने के लिए मेनू होते है ।

टैब पर प्रत्येक वस्तु, उपयोगकर्ता की गतिविधियों के अनुसार सावधा‍नीपूर्वक चयन की गई है. उदाहरण के लिए, होम टैब पर आपके द्वारा अधिकांश उपयोग की जाने वाली सभी चीजें होती हैं, जैसे फ़ॉन्ट बदलने के लिए फ़ॉन्ट समूह में आदेश: जेसे कट, कॉपी, पेस्ट फॉर्मेट पेंटर, फ़ॉन्ट आकार, बोल्ड, इटैलिक, अन्डरलाइन इत्यादि|

जब हम वर्ड ओपन करते है तो हमे सब से पहले खाली स्क्रीन दिखाई देती है| यहाँ पर सबसे ऊपर बाएं कोने में एक गोल बटन नजर आता है जिसे ऑफिस बटन कहते हैं जिसका उपयोग आप एक नई फाइल बनाने में, मौजूदा फ़ाइल को खोलने, फ़ाइल को सेव के लिए, और कई अन्य कार्य करने के लिए कर सकते हैं |

ऑफिस बटन के पास में तीन बटन वाला एक छोटा सा बॉक्स जिसे क्विक एक्सेस बार कहते हैं, जिसका उपयोग आप अपनी फाइल को सुरक्षित करने के लिए, आपके द्वारा लिए गए कार्य को पूर्ववत करने (undo), और कार्य को वापस लेने के लिए (redo) होता है।
एम.एस.वर्ड : विशेषताऐ तथा उपयोग

एम.एस.वर्ड दुनिया में सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाला सॉफ्टवेयर है । आज दुनिया के हर कोने में लोग डॉक्यूमेंट बनाने के लिए वर्ड का ही उपयोग करते है क्योंकि एम.एस.वर्ड को उपयोग करना बहुत ही आसान तथा किफायती है । एम.एस.वर्ड को काफी आसन ट्रेनिंग से सीखा जा सकता है तथा हर कोई डॉक्यूमेंट एडिट तथा टाइपिंग का काम घर बैठे कर सकता है । एम.एस.वर्ड की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं इस प्रकार है -

वेब सम्बन्धित विशेषताए :-

1. एम.एस.वर्ड के माध्यम से वेबसाइट से सम्बंधित फाइल बनाना बहुत ही सुगम तथा आसान हो गया है ।

2. डॉक्यूमेंट को HTML (हाइपर टेक्स्ट मार्कअप लेंग्वेज) में सेव किया जा सकता है जिसे इंटरनेट ब्राउज़र में देखा जा सकता है । वेबसाइट का निर्माण इन्हीं html फाइल्स से किया जाता है ।

3. एम.एस.वर्ड में मौजूद वेब पेज विज़ार्ड के माध्यम से बड़ी ही आसानी से वेब पेज बनाया जा सकता है ।

4. वेब पेज प्रीव्यू के माध्यम से वेब पेज का प्रीव्यू किसी भी समय देखा जा सकता है की वह पेज वेब ब्राउज़र पर कैसा दिखेगा।

5. हाइपरलिंक इंटरफ़ेस की मदद से दूसरे डाक्यूमेंट्स अथवा पेज को किसी भी पेज में लिंक कर सकते है और इस लिंक पर क्लिक करके पर सम्बंधित पेज खुल जाता है । इस फीचर के उपयोग से सम्बंधित डाक्यूमेंट्स को साथ में बढ़ी सुगमता से रखा जा सकता है ।

6. एम.एस.वर्ड को बड़ी आसानी से इंटरनेट से कनेक्ट किया जा सकता है तथा किसी भी डॉक्यूमेंट को बड़ी ही सरलता से इ-मेल किया जा सकता है ।

आन्तरिक विशेषताए:-

1. भाषा से सम्बंधित सेटिंग्स - एम.एस.वर्ड में बिना किसी दूसरी प्रक्रिया को प्रभावित किये यूजर अपनी मनपसंद भाषा का चयन कर सकता है । वर्ड दुनिया की सभी महत्वपूर्ण भाषाओँ को सपोर्ट करता है । भारतीय भाषाओँ जैसे की हिंदी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, पंजाबी, तेलगु, बंगाली, तमिल इत्यादि का आसानी से वर्ड में उपयोग किया जा सकता है तथा डॉक्यूमेंट बनाए जा सकते है ।

2. प्रूफिंग टूल्स का उपयोग कर यूजर अपनी पसंद की भाषा के लिए विशिष्ट सॉफ्टवेयर तथा प्लग-इन डाल सकता है और उस भाषा से सम्बंधित स्पेलिंग तथा व्याकरण जांचने के टूल्स भी डाल सकता है । इस प्रकार वर्ड दुनिया की हर भाषा में काम कर सकता है ।

3. असाइन लैंग्वेज के माध्यम से उसे अपनी मन पसंद भाषा का चुनाव कर सकता है जिसको कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम सपोर्ट करता है और फिर आसानी तथा सुगमता से काम कर सकता है ।

General Features (सामान्य विशेषताऐ)

1.ऑफिस असिस्टेंट - माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में काम करते समय यदि कुछ भी सहायता चाहिए होती है तो ऑफिस असिस्टेंट काम आता है । इस मदद से एम.एस. वर्ड से सम्बंधित किसी भी टॉपिक तथा फीचर की जानकारी उसी समय प्राप्त की जा सकती है । वर्ड के हेल्प टूल्स में सभी फीचर की जानकारती मौजूद रहती है जिनका उपयोग यूजर किसी भी समय कर सकता है ।

2.ड्राइंग टूल्स - एम.एस.वर्ड 3 -डायमेंशन (3D) शेप बनाने के टूल्स भी प्रदान करता है जिनकी सहायता से सुन्दर चित्र बना कर डॉक्यूमेंट में डाले जा सकते है । समान्यता ये चित्र विभिन्न आकृतिया जैसे की आयत, वर्ग, गोला , त्रिभुज इत्यादि होती है ।

3.माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस की सबसे बड़ी विशेषता इसके शक्तिशाली एडिटिंग टूल्स तथा प्रूफिंग टूल्स है । माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के माध्यम से हर तरह का डॉक्यूमेंट एडिट किया जा सकता है तथा उसमे मनचाहे परिवर्तन किये जा सकते है । एम.एस.वर्ड में व्याकरण तथा स्पेलिंग सम्बन्धित गलतियों को सही करने के लिए बहुत ही शक्तिशाली टूल्स है जिससे यह अपने एप्प गलत शब्द तथा पंक्ति को हाईलाइट कर देता है । जहाँ भी गलती होती है वह भाग लाल लाइन के साथ आने लग जाता है तथा वर्ड खुद ही सही व्याकरण तथा स्पेलिंग का सुझाव दे देता है जिसे सिर्फ एक क्लिक करके सही किया जा सकता है ।

4.टेम्पलेट विज़ार्ड - एम.एस.वर्ड पहले से निर्धारित फॉरमेट में टेम्पलेट प्रदान करता है जिनके उपयोग से यूजर जल्द तथा आसानी से सूंदर तथा अंतर्राष्ट्रीय स्टैंडर्ड्स के डॉक्यूमेंट बन सकता है । विभिन्न टेम्पलेट फोर्मट्स वर्ड में पहले से ही दिए होते है तथा इंटरनेट के माध्यम से और भी नए नए तथा सुन्दर टेम्पलेट अपनी आवश्यकतानुसार उपयोग में लिए जा सकते है ।

 5.मेल मर्ज - इस टूल की मदद से यूजर कम समय में पर्सनलाइज्ड लेटर तथा डॉक्यूमेंट बना सकता है । इसमें मुख्य डॉक्यूमेंट के साथ मर्ज कर कर कॉरेस्पोंडेंस लेटर्स तैयार कर सकते है । उदहारण के लिए, किसी लेटर में हर यूजर का नाम, फ़ोन नंबर तथा पता डालना है और बाकि का टेक्स्ट एक जैसा ही रहना है तो हम मेल मर्ज का उपयोग कर सभी लेटर शीघ्रता से बना सकते है ।


Sunday, June 14, 2020

प्रिंटर

प्रिंटर


प्रिंटर एक आउटपुट डिवाइस होती है, इसका प्रयोग कंप्‍यूटर के डेटा की हार्डकॉपी बनाने के लिये किया जाता है। की-बोर्ड, माउस के बाद प्रिंटर ही एक ऐसा डिवाइस है, जिसका इस्‍तेमाल सबसे अधिक किया जाता है। ऑफिस, घरों और व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठानों पर प्रिंटर का प्रयोग चिञ, ऑफिस डाक्‍यूमेंट प्रिंट करने के लिये किया जाता है। साधारण तौर पर प्रिंटर कंप्‍यूटर के साथ एक डाटा केबल से जुडा रहता है अौर किसी भी एप्‍लीकेशन से Ctrl+P कमांड देने पर वह आपको प्रिंट दे देता है। लेकिन अाजतक प्रिंटर के साथ नई तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। जिसमें वायरलैस प्रिंटिग मुख्‍य है। इसमें प्रिंटर को वाई-फाई और क्‍लाउड से जोडा जाता है। जिससे दूर बैठे ही आप प्रिंटर को कमाण्‍ड दे सकते हैं। क्‍लाउड तकनीक से आप मोबाइल से भी प्रिंटर को कमाण्‍ड दे सकते हैं अौर प्रिंट निकाल सकते हैं।
प्रिंटर्स को 2 केटेगरी में रखा जा सकता है -
1. इम्पैक्ट प्रिंटर
एक प्रभाव प्रिंटर कागज के साथ संपर्क में आता है। यह आमतौर पर एक हथौड़ा या पिन का उपयोग कर कागज के खिलाफ एक स्याही युक्त रिबन दबाकर प्रिंट की छवि बनाता है।
इम्पैक्ट-प्रिंटर के उदाहरण:
डॉट-मैट्रिक्स
डेज़ी-व्हील
ड्रम

2. नॉन-इम्पैक्ट प्रिंटर
वह प्रिंटर जिसमें छपाई के लिए स्याही वाला रिबन पन्नों के ऊपर चोट नहीं करता, नॉन-इम्पैक्ट प्रिंटर कहलाता है| इन प्रिंटर में छपाई के लिए स्प्रे व अन्य इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का प्रयोग किया जाता है|
नॉन-इम्पैक्ट प्रिंटर जैसे
इंक-जेट प्रिंटर
लेज़र प्रिंटर

Saturday, June 13, 2020

कम्प्यूटर डाटा

कम्प्यूटर डाटा 

कम्प्यूटर एक बहुत ही उपयोगी यन्त्र है । कम्प्यूटर यूजर द्वारा दिए हुए सभी प्रकार के निर्देशों को गणना के लिए संग्रहीत करता है जैसे - संख्या, नंबर, टेक्स्ट, ग्राफ़िक्स, चित्र इत्यादि। यह सभी डाटा तथा निर्देश अलग परन्तु कम्प्यूटर इन सभी डाटा तथा निर्देशों को बाइनरी भाषा में बदल कर संग्रहीत करता है । बाइनरी एक मशीन की भाषा है जिसका आधार सिर्फ दो संख्याएँ है - 0 तथा 1 । यूजर द्वारा दिए गए सभी निर्देश बाइनरी भाषा में 0 तथा 1 में परिवर्तित हो जाते है । इस प्रक्रिया को डाटा निरूपण कहते है । डाटा निरूपण के लिए दो तरीके होते है -

1. एनालॉग क्रियायें
2. डिजिटल क्रियायें

एनालॉग क्रियायें (Analog Operations)-

एनालॉग क्रियाएं लगातार परिवर्तनशील संकेत पर आधारित है । इनमे अंकों का प्रयोग नहीं होता है । एनालॉग क्रियाओं का प्रयोग विज्ञानं तथा इंजीनियरिंग के बहुत से क्षेत्रों में किया जाता है क्योंकि इन क्षेत्रों में भौतिक मात्राओं का उपयोग अधिक किया जाता है जैसे की स्पीडोमीटर, ओडोमीटर, वोल्टमीटर, थर्मामीटर इत्यादि

डिजिटल क्रियायें (Digital Operation)-

आधुनिक कम्प्यूटर डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक सर्किट (digital electronic circuits) द्वारा निर्मित होते हैं। इस सर्किट का मुख्य भाग ट्रांजिस्टर होता है जो दो अवस्थाओं 0 तथा 1 में कार्य करता है। कम्प्यूटर में डाटा को व्यक्त करने वाली इन दो अवस्थाओं को सम्मिलित रूप से बाइनरी संख्या प्रणाली कहते हैं।

बाइनरी डाटा को स्टोर करने के लिए एक प्रणाली बनाई गई है, जिसकी सबसे छोटी इकाई बिट है ।
4 बिट्स = 1 निबल
8 बिट्स = 1 बाइट
1024 बाइट्स = 1 किलोबाइट (KB)
1024 किलोबाइट = 1 मेगाबाइट (MB)
1024 मेगाबाइट = 1 गीगाबाइट (GB)
1024 गीगाबाइट = 1 टेराबाइट (TB)

Wednesday, June 10, 2020

What is Motherboard

Motherboard
motherboard is the most important part of computer. In which all the necessary equipment are connected. Includes CPU, RAM, HDD, Monitor, BIOS, CMOS, Mouse and keyboard etc. connected via Dedicated Ports. The motherboard delivers power supply to these devices and makes communication among themselves.
The motherboard is a plastic sheet in which various ports are made to connect the equipment. Connection of  The each port is solder to the motherboard. Which we can also see with our eyes.
Motherboard Functions - Functions of Motherboard
The motherboard provides space to connect the accessories. Therefore it is also called backbone of computer.
It provides power supply to connected devices and also manages them.
Conducts communication of one device with another.
The BIOS of the computer preserves the settings and information so that the computer can run smoothly.
Different motherboard parts
The motherboard acts as a Base or Components' Hub. With which all the necessary computer equipment is connected. Each device is connected to a Dedicated Place. This place or place is called Port.

Main motherboard
Intel
ASUS
Gigabyte
Amd
Acer
Msi
ABIT
Aopen
Biostar

Motherboards have different types of ports. In which different devices of the computer can be connected. Complete information of motherboard ports

Serial port
Serial ports are used to connect additional modems and older mice. These Ports come in two models 9 Pin and 25 Pin.

Parallel Port
Scanners & Printers are connected in these ports. It consists of Ports 25 Pin. They are also called Printer Port.

PS / 2 Port
These ports are round in shape. They connect the mouse and keyboard. Nowadays these ports are used very rarely.

USB Ports
There is USB (Universal Serial Bus). All types of USB devices such as mouse, keyboards, printers, hard disks etc. can be connected by USB ports and their data transfer capability is much faster and more.

VGA Port
Performs the task of connecting Computer Monitor
 Its structure is similar to Serial Port.

Power connector
A Power Connector is used to connect the motherboard to Power. Power does not go directly to the motherboard. It first goes to the SMPS and then reaches the motherboard.

Modem port
Modem Port is used to connect the computer to the Internet. It is somewhat like a USB port.

External ports
These ports are used to connect one computer to another. Network cable is added to them.

Game port
Game ports are used to connect Game Consoles and Joystics. However, nowadays USB ports have started being used in their place.

DVI Port
DVI (Digital Video Interface). DVI Port is used to connect Flat Panel Monitors i.e. LCD, LED to computer.

Sockets
Sockets are used to connect Speakers and Microphones to computers. They are round and small.

मदरबोर्ड कि पुरी जानकारी

मदरबोर्ड
मदरबोर्ड कम्प्युटर का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है. जिसमे सभी आवश्यक उपकरण जुडे रहते हैं. CPU, RAM, HDD, Monitor, BIOS, CMOS, Mouse और keyboard आदि शामिल है जो Dedicated Ports के माध्यम से जुडे रहते हैं. मदरबोर्ड इन उपकरणों को Power Supply पहुँचाता है और आपस में Communication करवाता हैं.
मदरबोर्ड एक प्लास्टिक शीट होती हैं जिसमे उपकरणॉं को जोडने के लिए विभिन्न Ports बनाये जाते है. प्रत्येक पोर्ट का Connection मदरबोर्ड के Solder हुआ रहता हैं. जिसे हम अपनी आंखों से भी देख सकते हैं.
मदरबोर्ड के कार्य – Functions of Motherboard 
मदरबोर्ड सहायक उपकरणों को जोडने के लिए जगह उपलब्ध करवाता है. इसलिये इसे कम्प्युटर की Backbone भी कहा जाता हैं.
यह Connected Devices को Power Supply पहुँचाता है और उन्हे Manage भी करता हैं.
एक उपकरण की दूसरे उपकरण के साथ बातचीत यानि Communication करवाता हैं.
Computer की BIOS Settings और सूचना को सुरक्षित रखता है ताकि कम्प्युटर आसानी से चालु हो सके.
मदरबोर्ड के विभिन्न भाग
मदरबोर्ड एक Base या Components’ Hub की तरह काम करता हैं. जिससे सभी और आवश्यक कम्प्युटर उपकरण जुडे रहते हैं. प्रत्येक उपकरण एक Dedicated Place पर Connect होता हैं. इस Place या जगह को Port कहा जाता हैं.

प्रमुख मदरबोर्ड 
Intel
ASUS
Gigabyte
AMD
Acer
MSI
ABIT
AOpen
Biostar

मदरबोर्ड में विभिन्न प्रकार के Ports होते हैं. जिनमें कम्प्युटर के अलग-अलग उपकरणों को जोडा जा सकता हैं. Motherboard Ports की पूरी जानकारी 

Serial Port
Serial Ports का उपयोग अतिरिक्त मॉडेम और पुराने माउसों को जोडने के लिया किया जाता हैं. ये Ports 9 Pin और 25 Pin इन दो मॉडल में आते हैं.

Parallel Port
इन Ports में Scanners & Printers को कनेक्ट किया जाता है. यह Ports 25 Pin में होते हैं. इन्हे Printer Port भी कहा जाता हैं.

PS/2 Port
इन Ports का आकार गोल होता हैं. इनके द्वारा माउस और की-बोर्ड को जोडा जाता हैं. आजकल इन पोर्ट का इस्तेमाल बहुत कम किया जाता हैं.

USB Ports
USB (Universal Serial Bus ) होता हैं. USB Ports के द्वारा सभी प्रकार के USB Devices जैसे माउस, की-बोर्ड, प्रिंटर, हार्ड डिस्क आदि को कनेक्ट किया जा सकता है और इनकी डाटा ट्रांसफर करने की क्षमता बहुत तेज और ज्यादा होती हैं.

VGA Port
Computer Monitor को जोडने का कार्य करता हैं
 इसकी बनावट Serial Port के जैसी ही होती हैं.

Power Connector
Motherboard को Power से जोडने हेतु Power Connector का इस्तेमाल होता हैं. पॉवर सीधे मदरबोर्ड में नही जाती हैं. यह पहले SMPS में जाती हैं इसके बाद मदरबोर्ड में पहुँचती हैं.

Modem Port
Computer को इंटरनेट से जोडने के लिए Modem Port को इस्तेमाल किया जाता हैं. इसकी बनावट कुछ-कुछ USB Port के जैसी होती हैं.

External Ports
एक कम्प्युटर को दूसरे कम्प्युटर से जोडने के लिये इन Ports का इस्तेमाल किया जाता हैं. इनमे Network Cable को जोडा जाता हैं.

Game Port
Game Consoles और Joystics को जोडने के लिए गेम पोर्ट का इस्तेमाल किया जाता हैं. मगर, आजकल इनकी जगह USB Ports का इस्तेमाल होने लगा है.

DVI Port
DVI (Digital Video Interface ) होता हैं. DVI Port का उपयोग Flat Panel Monitors यानि LCD, LED को कम्प्युटर से जोडने के लिए किया जाता है.

Sockets
Speakers और Microphones को कम्प्युटर से कनेक्ट करने के लिए Sockets का इस्तेमाल किया जाता है. ये गोल और छोटे होते हैं.

नया कम्प्यूटर खरीदने से पहेले किन बातो का ध्यान रखें

Desktop 


ये एक simple सी choices में से एक है, और इससे आपके cost में बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा. और खर्च में भी, जो शायद अभी आपको नहीं पता चलेगा.  but इससे कुछ ज्यादा फर्क नहीं है

Laptop

But अगर आपको small hardware में बहुत से components को store करना है, और उसे ले कर एक जगह से दूसरी जगह जाना है, तो laptop better है.

Computer का Processor
एक new computer लेते समय  processor के बारे में कुछ बाते जरुर पता होनी चाहिए
अगर आपको एक fast computer चाहिए, जो की programs को बहुत तेज़ी से Run करवाऐ, tasks को बहुत जल्दी करता है, और आपको wait नहीं करवाता, तो आपको सबसे strongest processor लेना चाहिए. और कौन ऐसा नहीं चाहता. 


Dual Core – home use 

i3 Processor – office /work 

i5 Processor -gaming 

i7 Processor 

Ram





1. आज के time में RAM को Gigabytes में measure किया जाता है. 
2. ज्यादा RAM होने से आपका computer ज्यादा files store कर के भी speed maintain करता है. 
3.RAM में बहुत काम data store किया जा ससकता है

2 GB RAM – Normal use for dual core 


4 GB RAM – Medium use के I5 and I3 के साथ use कर सकते है.


8 GB RAM – Professional use

Hard Drive




हर computer को data store की जरुरत होती है,क्योंकि RAM जो save करेगा   वो hard drive में जाता है. आप computer में बहुत चीज़ें store करना चाहेगे  तो जितना  हो सके, उतने ज्यादा Gigabytes या Terabytes का hard drive लें.अगर आप अपने computer पे बहुत से applications रखना चाहते हैं, और ज्यादा media नहीं रखना चाहते, तो कम memory वाला hard drive लें, और पैसे बचाएँ. अगर आप एक fast computer खरीदना चाहते हैं, और आपके पास money भी है तो ज्यादा memory वाले hard drives या flash hard drives का use करें.


Graphics 



Computer बनाने वाले अपने computer की screen  पर हमेशा stickers लगाते हैं, की उसने कौन-सा graphic card computer में use किया  जैसे की AMD और NVIDIA graphics cards. हम में से ज्यादातर लोग  ध्यान नहीं देते, आपको gaming और heavy software के लिए, graphic card का selection  करना होता है

Sunday, June 7, 2020

कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है? ( कम्प्यूटर खरीदते समय प्रोसेसर कि जानकारी अवश्य होनी चाहिए)




रोजाना कंप्यूटर का इस्तेमाल करते है तो आपने कभी सोचा है की आखिर कैसे कंप्यूटर हमारे दिए गये निर्देशो के अनुसार कार्य करता है तो आज हम जानेंगे की कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है? (What is Computer Processor in Hindi) और ये कैसे काम करता है।

कंप्यूटर एक मशीन (Machine) है जो डेटा को इनपुट (Input) के रूप में स्वीकार कर, उस डाटा (Data) को प्रोसेस (Process) करता है तथा उचित परिणाम (Result) को आउटपुट (Output) के रूप में हमे प्रदान करता है। जटिल कार्यों को पूरा करने के लिए डेटा को संग्रहीत (Store) भी करता है और ये गणनाएं सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (CPU) के द्वारा होता है जिसे माइक्रोप्रोसेसर


(Microprocessor) के रूप में भी जाना जाता है जो कि कंप्यूटर सिस्टम का दिमाग कहलाता है।


माइक्रोप्रोसेसर डेटा और निर्देशों के रूप में कीबोर्ड या माउस जैसे इनपुट डिवाइस से इनपुट स्वीकार करता है। यह निर्देशों का उपयोग कर डेटा को प्रोसेस करता है और प्राप्त परिणाम मतलब डाटा को आउटपुट डिवाइस


जैसे मॉनिटर या प्रिंटर पे भेजता है। एक कंप्यूटर की प्रोसेसिंग यूनिट सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (सीपीयू) है।

प्रोसेसर CPU बॉक्स (Cabinet) के अंदर मौजूद होता है और कंप्यूटर की सभी गणना करता है। क्या आप जानते हैं कि आपका मस्तिष्क आपके लिए क्या करता है? यह चीजों को याद करता है और निर्णय लेता है यह गणना और कई अन्य चीजें भी करता है।


प्रोसेसर (Processor) कंप्यूटर के मस्तिष्क (Brain) के रूप में जाना जाता है और कंप्यूटर के सभी कार्य इसी के द्वारा होती है। इस तरह आप कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है? (Computer Processor Kya Hai) जान चुके है।

विषय-सूची

  • कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है? (What is Computer Processor in Hindi)
  • प्रोसेसर कोर क्या है? (What is Core in Processor in Hindi)
  • प्रोसेसर के प्रकार कितने है? (Types of Processor in Hindi)
  • प्रोसेसर काम कैसे करता है? (How Processor Works in Hindi)
  • प्रोसेसर बनाने वाली कंपनिया कौन-कौन है? (Processor Manufacturing Companies)

कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है? (What is Computer Processor in Hindi)

कंप्यूटर प्रोसेसर एक माइक्रोचिप होता है जो कंप्यूटर के मदरबोर्ड (Motherboard) में लगी होती है और कंप्यूटर से जुरे सभी कंपोनेंट्स को नियंत्रित करता है। यह डाटा इनपुट के रूप में लेता है और उसे हज़ारो-लाखों गुना तेज़ी से प्रोसेस कर हमे परिणाम आउटपुट के रूप में आउटपुट डिवाइसेस की सहायता से देता है। प्रोसेसर एक मल्टी प्रोग्रामेबल लॉजिकल डिवाइस है।

प्रोसेसर को डेटा की प्रोसेसिंग के लिए जानकारी की आवश्यकता होती है। और यह इस जानकारी को मेमोरी जैसे RAM से प्राप्त करता है। मेमोरी से डाटा को प्राप्त करने की  प्रक्रिया में लगने वाले समय को कम करने के लिए हम कैश (Cache) मेमोरी का इस्तेमाल करते है।

नवीनतम माइक्रोप्रोसेसर को Level 1 (L1) कैश के रूप में जाना जाता है। माइक्रोप्रोसेसर कैश में आवश्यक जानकारी संग्रहीत रखता है। माइक्रोप्रोसेसर पहली बार उस सूचना की जांच कैश मेमोरी में करता है अगर माइक्रोप्रोसेसर कैश में आवश्यक जानकारी पाता है। तो इसे कैश हिट (Cache Hit) के रूप में जाना जाता है और अगर माइक्रोप्रोसेसर आवश्यक जानकारी नहीं खोजता पाता है, तो इसे कैश मिस (Cache Miss) के रूप में जाना जाता है और प्रोसेसर RAM में दी गई जानकारी के लिए खोज करता है।

कंप्यूटर प्रोसेसर की पहचान विभिन्न पहलुओं पर आधारित हैं, जैसे कि Clock SpeedFSB, और L2 Cache. प्रोसेसर कितना तेज़ी से काम करता है इसको मापने के लिए Gigahertz का इस्तेमाल होता है। प्रोसेसर में जितना ज्यादा Gigahertz का प्रोसेसर होगा उसकी प्रोसेसिंग स्पीड उतनी ही तेज होगी।

  • क्लॉक स्पीड (Clock Speed): प्रोसेसर की गति विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है जैसे कि Bandwidth और Clock Speed इत्यादि। क्लॉक स्पीड उस गति को व्यक्त करता है जिस पर माइक्रोप्रोसेसर एक निर्देश को संभालता है। माइक्रोप्रोसेसर की Clock Speed 66 MHZ से 3.8 GHZ तक रहती है।
  • FSB (Front Side Bus): FSB सिस्टम मेमोरी में सीपीयू की गति को दर्शाता है यह उस गति को मापता है जिस पर CPU, RAM के साथ संचार करता है। FSB की गति 66 से 1333 MHz तक होती है।
  • L2 कैश (L2 Cache): अधिकांश प्रोसेसर के पास Level 2 कैश मेमोरी होती है ये Level 1 कैश की तरह की काम करती है  256 KB से 8 MB तक इसकी संग्रहण करने की क्षमता होती है।

प्रोसेसर कोर क्या है? (What is Core in Processor in Hindi)

मुख्यतः कोर (Core) सीपीयू की मूल गणना इकाई है, Intel प्रोसेसर्स हाइपरथ्रेडिंग (Hyper Threading) का समर्थन करते है। सरल शब्दों में, इंटेल द्वारा विकसित प्रोसेसर्स हाइपरथ्रेडिंग का इश्तेमाल करते है हाइपरथ्रेडिंग तकनीक द्वारा एक प्रोसेसर दो लॉजिकल विभिन्न प्रोसेसर के रूप में कार्य करता है। उदाहरण के लिए, आप वर्ड प्रोसेसिंग (Word Processing) एप्लिकेशन में एक स्पेल (Spell) चेक कर सकते हैं और एक ही समय में एंटिवायरस द्वारा सिस्टम स्कैन भी कर सकते है।

तो आप समझ ही गये होंगे की सिंगल कोर, डुअल-कोर, क्वाड-कोर, ऑक्टा-कोर क्‍या हैं ? इनका सीधा का मतलब है की एक प्रोसेसर ड्यूल कोर तो 2 लॉजिकल प्रोसेसर की तरह काम करेगा, क्वार्ड, कोर 4 लॉजिकल प्रोसेसर की तरह, ऑक्टा-कोर 8 लॉजिकल प्रोसेसर की तरह काम करेगा।

ज्यादा कोर (Core) मतलब गज़ब की प्रोसेसिंग स्पीड, ज्यादा तेज गेमिंग, फुल स्पीड मल्टि-टास्किंग, फ़ास्ट विडियो एडिटिंग रेंडरिंग स्पीड, फुल एचडी विडियो प्लेबैक करने की क्षमता इत्यादि। अब तो आप जान ही गये होंगे कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है ? और ये कैसे काम करता है अब इसके प्रकार के बारे में जानते है।

प्रोसेसर के प्रकार कितने है? (Types of Processor in Hindi)

1993 में Intel Pentium माइक्रोप्रोसेसर के लौंच ने कंप्यूटर सिस्टम को एक साथ दो कार्यो करने के सक्षम बनाया जिनके द्वारा ऐसे कार्यो को निष्पादित करने की क्षमता जिसमें अधिक प्रोसेसिंग की आवश्यकता थी।

इंटेल तब धीरे-धीरे विभिन्न प्रयोजनों (Purposes) के लिए 

Pentium 2, Celeron, Pentium 3 और Pentium 4, Dual Core, Core2 Duo, Core2 Quad, Core i3, Core i5 और Core i7 प्रोसेसर विकसित करता चला गया। अब आप कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है ? और ये कितने प्रकार के है जान चुके है अब जानते है ये काम कैसे करता है।

प्रोसेसर काम कैसे करता है? (How Processor Works in Hindi)

CPU (Central Processing Unit) के तीन भागों हैं:

  • ALU (Arithmetic and Logic Unit): यह सभी अंकगणितीय गणना करता है, ALU चिप CPU का एक स्मार्ट हिस्सा है जो संपूर्ण अंकगणित और तर्क कार्य करता है जैसे कि जोड़ना, घटाना, गुणा करना और विभाजन करना। यह तर्क आदेश भी पढ़ता है जैसे कि ORAND और NOTControl Unit ALU को निर्देश भेजकर कार्य करने के लिए कहता है। Control Unit द्वारा नियुक्त किए गए कार्य को पूरा करने के लिए ALU रजिस्टरों से डेटा लेता है ALU चिप में प्रोसेसिंग का अंतिम चरण है।
  • CU (Control Unit): यह कंप्यूटर की सभी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। यह कंप्यूटर के अन्य भागों को बताता है कि उन्हें क्या करना चाहिए। नियंत्रण इकाई (Control Unit) माइक्रोप्रोसेसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि यह एक माइक्रोप्रोसेसर की पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। यह Decode Unit से निर्देशों पर सीपीयू के एक अलग हिस्से का उपयोग करके निर्देशों का विश्लेषण, और निष्पादित करता है, यह Control Signals बनाता है जो अंकगणित तर्क इकाई (ALU) को बताता है और रजिस्टरों कैसे संचालित होता है, किस पर चल रहा है, और परिणामों के साथ क्या करना है Control Unit सुनिश्चित करता है कि सही समय पर सबकुछ ठीक होता है।
  • MU (Memory Unit): यह डेटा और निर्देशों अस्थायी रूप से संग्रहीत करता है। जब कंप्यूटर कार्यशील होता है सरल शब्दों में जो कंप्यूटर डाटा को प्रोसेस करता है तो मेमोरी यूनिट डेटा और निर्देशों को अस्थायी रूप से संग्रहित करने में होता है। अब आप कंप्यूटर प्रोसेसर क्या है ? और उसके कार्यप्रणाली को समझ चुके है अब प्रोसेसर बनाने वाली कंपनिया कौन-कौन है? हम जान लेते है।
प्रोसेसर बनाने वाली कंपनिया कौन-कौन है? (Processor Manufacturing Companies 
Intel और AMD दो बड़े नाम है प्रोसेसर्स बनाने वाली कंपनियों में लेकिन ARM processors आज भी ज्यादातर स्मार्टफोन में इस्तेमाल किया जाता है, Qualcomm और MediaTek अभी भी शीर्ष पर है। MIPS एक अन्य प्रकार की प्रोसेसर आर्किटेक्चर (Architecture) है, जो मुझे लगता है कि नेटवर्किंग (Networking) डिवाइसों में ज्यादातर प्रयोग किया जाता है।


Friday, June 5, 2020

Memory ( RAM) क्या है

मेमोरी ( RAM) कम्प्यूटर का वह पार्ट है जो कम्प्यूटर पर स्क्रीन दिखाने का काम करता है  और मेमोरी  से  कम्प्यूटर कि स्पीड भी बड़ती है मेमोरी कम्प्यूटर का बुनियादी 




कम्प्टूयर की प्राइमरी मेमोरी तीन प्रकार की होती है।


  रैम (RAM( Random Access Memory )

रैम कंप्यूटर की अस्थाई मेमोरी होती है क्योकि कंप्यूटर को बंद करने पर  इसमें स्टोर डाटा (सूचना ) नष्ट हो जाती है इस मेमोरी का उपयोग सी पी यू  पर क्रियान्वित होने वाले प्रोग्राम  संगृहीत करने के लिए किया जाता है।  सी पी यू द्वारा प्रोग्राम के क्रियान्वयन के बाद रैम में स्टोर डाटा को हटाकर नये डाटा रैम में स्टोर हो जाता है इस मेमोरी में सूचनाओं को किसी भी स्थान पर स्टोर कर सकते है।  रैम की क्षमता ६४ मेगाबाइट से लेकर ४ गीगा बाइट तक  हो सकती है।


रैम मेमोरी का प्रकार (Type of RAM )

रैम कंप्यूटर में दो प्रकार के उपयोग किया जाता है।


i  - डायनमिक रैम(Dynamic RAM )

१-डायनामिक रैम में स्टोर सूचना को कुछ ही मिली सेकंड के बाद पुनः लिखना पड़ता है नहीं तो ये सूचनाएं समाप्त हो जाती है।

२- डायनामिक रैम की स्टोर क्षमता अधिक होती है।

३-डायनामिक रैम की गति कम होती है।

४- डायनामिक रैम सस्ती होती है।

२- रीड ओनली मेमोरी (ROM)

३- कैश (कैश)


ii  - स्टैटिक रैम (Static RAM )


१-स्टैटिक मेमोरी में सूचना को पुनः लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।  उसमे स्टोर सूचना तब तक रहती है जब तक इसमें विधुत धारा प्रवाहित होती है।

२- स्टैटिक रैम की स्टोर क्षमता कम होती है।

३- स्थैतिक रैम की गति अधिक होती है।

४- स्टैटिक रैम महंगी होती है।


- रीड ओनली मेमोरी (ROM )

रीड ओनली मेमोरी में रखीं गयी सूचना को केवल पढ़ा जा सकता है।   इस मेमोरी में न तो कुछ लिखा जा सकता है न ही लिखी गई सूचना को बदला जा सकता है।  यह स्थाई मेमोरी होती है। कंप्यूटर को बंद करने पर इसमें स्टोर डाटा नष्ट नहीं होता है।  इस मेमोरी में कंप्यूटर निर्माण के समय ही सूचनाएं संगृहीत कर दी जाती है। 

           कंप्यूटर को ऑन करते ही ROM में स्टोर प्रोग्राम स्वतः ही क्रियान्वित हो जाते है।  ये प्रोग्राम कंप्यूटर के सभी उपकरणों की जांच कर उन्हें सक्रिय अवस्था में लाते है। रोम में स्टोर प्रोग्राम को BIOS(Basic Input Output System ) कहा जाता है।

i-PROM(Programmable Read Only Memory)

इस प्रकार के रोम में प्रारम्भ में खली होती है इसमें उपयोगकर्ता विशेष उपकरणों से अपने प्रोग्राम को स्टोर कर सकता है।  एक बार प्रोग्राम स्टोर हो जाने के बाद उनको बदला या हटाया नहीं जा सकता।

ii -EPROM( Erasable Programmable Read Only Memory)

यह मेमोरी प्रोम (PROM) की तरह ही होती है। लेकिन इसमें स्टोर प्रोग्राम को पराबैगनी किरणों ( Ultra Violet Rays   ) की सहायता से हटाया जा सकता है और उसे फिर से लिखा जा सकता है।

iii -EEPROM(Electrically Erasable Programmable Read Only Memory)

यह मेमोरी ईप्रोम (EPROM) की तरह ही होती है।लेकिन इसमें स्टोर प्रोग्राम को विधुतीय विधि (Electrical Method ) की सहायता से हटाया जा सकता है और उसे फिर से लिखा 




सेकेंडरी मेमोरी (Secondary Memory)


इस मेमोरी को एक्सटर्नल (External) या सहायक (Auxiliary) मेमोरी भी कहते है। यह मेमोरी प्राइमरी मेमोरी से सस्ती होती है। इस मेमोरी में स्टोर सूचना कंप्यूटर के बंद होने के बाद नष्ट नहीं होता है यह डाटा को स्थाई रूप से स्टोर करता है इसलिए इसे स्थाई मेमोरी भी कहते है। सेकेंडरी मेमोरी में डाटा स्टोरेज क्षमता प्राथमिक मेमोरी की तुलना में बहुत अधिक होता है।  


सेकेंडरी मेमोरी कंप्यूटर में विभिन्न प्रकार की होती है। जिसके बारे में निचे दिया गया है।  


हार्ड डिस्क ड्राइव (Hard Disk Drive (HDD))


हार्ड डिस्क कंप्यूटर की सेकेंडरी मेमोरी है जो स्थाई रूप से लगा रहता है। सी पी यू द्वारा डाटा और प्रोग्राम लोड करने तथा डाटा को स्टोर करने के लिए भी हार्ड डिस्क का उपयोग किया जा सकता है। वर्तमान समय में ५०० गीगा बाइट तक की क्षमता वाले हार्ड डिस्क का उपयोग हो रहा है। हार्ड डिस्क धूलरहित और ठन्डे वातावरण में चलाया जाना चाहिए।  


सी डी और सी डी ड्राइव (CD and CD Drive)


CD-ROM कॉम्पैक्ट रीड ओनली मेमोरी डिस्क के स्पाइरल ट्रैक डाटा को रिकॉर्ड और रीड करने के लिए लेजर बीम (laser beam ) का उपयोग करता है। इस मेमोरी में डाटा स्टोर करने की क्षमता ७०० मेगा बाइट होता है। यह एक स्थाई मेमोरी भी है जो डाटा को स्थाई रूप से स्टोर करती है जिसे एक कंप्यूटर की सूचना को दूसरे कंप्यूटर पर आसानी से ले जा सकते है और ला सकते है।

डीवीडी डिस्क (DVD(Digital Video Disk )


यह मेमोरी सी डी डिस्क की भाति होती है लेकिन इसकी डाटा स्टोरेज क्षमता सी डी डिस्क से ज्यादा होती है 4.७ गीगा बाइट होती है ।  


बी आर डी (BRD( Blu ray disk ))


यह मेमोरी डी वी डी डिस्क की भाति होती है लेकिन इसकी डाटा स्टोरेज क्षमता डी वी डी डिस्क से ज्यादा होती है २५ गीगा बाइट से लेकर १२८ गीगा बाइट तक होती है ।


 पेन ड्राइव (Pen Drive)


यह कंप्यूटर की सेकेंडरी और स्थाई USB (Universal Service Bus ) फ्लैश मेमोरी ड्राइव है जो डाटा को स्थाई रूप से स्टोर करती है।


मैग्नेटिक टेप्स (Magnetic Tapes)


यह कंप्यूटर की सेकेंडरी मेमोरी है जो चुंबकीय टेप सुप्रसिद्ध संग्रहण माध्यम है जो बड़े कंप्यूटर सिस्टम में उपयोग होते है। डाटा को चुंबकीय टेप पर संगृहीत करके क्रमशः रीड किया जाता है। चुंबकीय टेप कई रिलो में उपलब्ध है।  


फ्लॉपी और फ्लॉपी डिस्क ड्राइव (Floppy and Floppy Disk Drive)

फ्लॉपी एक लचीला ३.५ इंच व्यास का वृत्तीय डिस्क है जो प्लास्टिक से लेप हुआ है और चुंबकीय वस्तु से बना है। यह एक वर्गाकार प्लास्टिक जैकट में रखा  जाता है।  इसकी डाटा स्टोरेज क्षमता बहुत कम होता है।  यह मेमोरी वर्तमान समय में इसका उपयोग कम  होने के कारण समाप्ति की और है।

Thursday, June 4, 2020

कम्प्यूटर वायरस ?




कम्प्यूटर वायरस


वायरस एक प्रोग्राम है जो हमारे कम्प्यूटर सिस्टम में बिना हमारी इच्छा तथा जानकारी के लोड हो जाता है । एक वायरस बार-बार खुद की प्रतिलिपि तैयार कर सकता है और उपलब्ध सारे मेमोरी का उपयोग कर सिस्टम की गति को धीरे या पूर्णतः रोक सकता है । कुछ वायरस कम्प्यूटर के बूटिंग से स्वंय को जोड़ लेता है तथा जितनी बार कम्प्यूटर बूट करता है वह उतना ही फैलता जाता है या कम्प्यूटर को रिबूट करता करता रहता वह कम्प्यूटर के डेटा या प्रोग्राम को क्षति पहुँचाता है । 




कम्प्यूटर वायरस भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं :


बूट सेक्टर वायरस (Boot Sector Virus)

परजीवी वायरस (Parasitic Virus)

मल्टीपार्टाइट वायरस (Multipartite Virus)

लिंक वायरस (Link Virus)

मैक्रो वायरस (Macro Virus)

वायरस को नष्ट करने के लिए बनाये गये प्रोग्राम या सॉफ्टवेयर को एन्टीवायरस कहते हैं । इसमें आटो प्रोटेक्ट तथा रियाल टाइम प्रोटेक्सन की सुविधा रहती है जो इंटरनेट से किसी फाइल का उपयोग करने के पहले उसे जाँच लेता है कि यह वायरस मुक्त है या नहीं । अगर फिर भी वायरस सिस्टम में सक्रिय हो जाता है, तो कुछ समय के अंतराल पर पूर्ण सिस्टम स्कैन चलाकर हम


कुछ कम्प्यूटर वाइरस निम्नलिखित है :


सी-ब्रेन (C-Brain)

मंकी (Monkey)

वान हॉफ (Vanhalf)

माइकल एंगेलो (Michelangelo)

क्रिपर (Creeper)

हैप्पी वर्थडे जोशी (Happy Birthday Joshi)

कंप्यूटर वायरस को कैसे रोकें (How to prevent computer viruses)?

निम्नलिखित उपाय वायरस के संक्रमण को रोकने में मदद कर सकते हैं:


Antivirus और antispyware software install करें और इसे up to date रखें।

एंटीवायरस सॉफ़्टवेयर के रोज़ स्कैन करें।

ईमेल के माध्यम से भेजे गए वेब लिंक पर क्लिक न करें

Hardware-based Firewall install करें।

अपने नेटवर्क को सुरक्षित करें।

क्लिक करने से पहले सोचें।

Open Wi-Fi का उपयोग न करें।

अपनी फाइलों का बैक अप रखें ।

Strong Passwords का उपयोग करें।

 


संकेत जिससे आप जान सकें कि आपका Computer Virus से संक्रमित है

निम्नलिखित संकेत जिससे जानें कि आपका कंप्यूटर वायरस से संक्रमित हो सकता है:


कंप्यूटर को start up होने में लंबा समय लगता है और प्रदर्शन धीमा होता है।

कंप्यूटर अक्सर क्रैश, या शटडाउन और error messages का अनुभव करता है।

कंप्यूटर गलत तरीके से व्यवहार करता है, जैसे कि क्लिक करने पर या फ़ाइलों को खोलने पर जवाब नहीं देना।

कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव अजीब तरह से काम कर रही होती है; उदाहरण के लिए, लगातार घूमना या लगातार शोर करना।

कंप्यूटर पर storage की मात्रा कम हो जाती है।

कंप्यूटर पर फ़ाइलें और अन्य डेटा गायब हो जाते हैं।

 

कंप्यूटर वायरस का इतिहास – History of computer viruses in Hindi

पहला कंप्यूटर वायरस “Elk Cloner” था, जिसने फ्लॉपी डिस्क के माध्यम से Apple II operating systems को संक्रमित किया और संक्रमित कंप्यूटरों पर एक विनोदी संदेश प्रदर्शित किया। Elk Cloner, जिसे 1982 में 15 वर्षीय Richard Skrenta द्वारा विकसित किया गया था जो कि प्रैंक के रूप में डिजाइन किया गया था, लेकिन इसने प्रदर्शित किया कि कैसे एक potentially malicious program को Apple कंप्यूटर की मेमोरी में इंस्टॉल किया जा सकता है। 

Wednesday, June 3, 2020

कम्प्यूटर की भाषायें क्या है

कम्प्यूटर की भाषायें क्या है ?

मनुष्य को एक-दूसरे से बातचीत करने के लिए भाषा की आवश्यकता होती है । भाषा संचार का एक साधन है । ठीक उसी तरह, कम्प्यूटर से बातचीत करने के लिए हमें कम्प्यूटर की भाषाओं की जानकारी होनी चाहिए । कम्प्यूटर भाषायें अनेक प्रकार की होती है जिनके अपने ही संकेत, कैरेक्ट और प्रयोग करने के नियम होते हैं जो की इंसान को कम्प्यूटर से बातचीत करने में सहायता करते हैं ।

तार्किक रूप से सम्बन्धित निर्देशों का समूह जिसे क्रमानुसार व्यवस्थित किया होता है ताकि वह कम्प्यूटर को समस्या सुलझाने में मार्गदर्शन करे, प्रोग्राम कहलाता है । वे भाषायें जिनमें प्रोग्राम लिखे जाते हैं, प्रोग्रामिंग कहलाती हैं । सही नतीजे पाने के लिए इसे सही ढंग से प्रोग्राम किया जाना आवश्यक है ।

इन प्रोग्रामिंग भाषाओं को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है :

  1. मशीनी भाषा (Machine Language) :- मशीनी भाषा ( Machine language ) वह भाषा होती है जिसमें केवल 0 और 1 दो अंको का प्रयोग होता है यह कंप्‍यूटर की आधारभूूत भाषा होती है जिसे कंप्‍यूटर सीधे सीधे समझ लेता है, मशीनी भाषा बायनरी कोड में लिखी जाती है जिसके केवल दो अंक होते हैं 0 और 1 चूंकि कम्प्यूटर मात्र बाइनरी संकेत अर्थात 0 और 1 को ही समझता है और कंप्‍यूटर का सर्किट यानी परिपथ इन बायनरी कोड को पहचान लेता है और इसे विधुत संकेतो ( Electrical signals ) मे परिवर्तित कर लेता है इसमें 0 का मतलब low या Off है और 1 का मतलब High या On ।

  2. असेम्बली भाषा (Assembly Language) :- असेम्बली भाषा (Assembly Language) एक ऐसी कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा हैं जिसमे अंकीय संकेतो के स्थान पर अक्षर अथवा चिन्हो का प्रयोग किया जाता है, इस कारण असेम्बली भाषा symbol language भी कहलाती है । असेम्बली भाषा (Assembly Language) एक निम्न स्तरीय भाषा (Low Level Language) है, असेंबली लैंग्वेज प्रोग्रामिंग लैंग्वेज की सेंकेंड जेनरेशन है ।

  3. उच्च-स्तरीय भाषा (High Level Language) :- उच्च स्तरीय भाषा (High level language) कम्प्यूटर में प्रयोग की जाने वाली वह भाषा है जिसमे अंग्रेजी अक्षरो, संख्याओ एवं चिन्हो का प्रयोग करके प्रोग्राम लिखा जाता है उच्च स्तरीय भाषा (High level language) किसी भी प्रकार के प्रोससर पर कार्य कर सकती है इसे आसानी सेसमझा जा सकता है यह सामान्य अंग्रेजी जैसी लगती है। इसे कम्पाइलर द्वारा अनुवाद करके मशीनी भाषा में बदला जाता है । इसके उदाहरण है, C++,JAVA,HTML,PASCAL, Ruby आदि

हर देश तथा राज्य की अपनी अपनी भाषा होती हैं और इसी भाषा के कारण लोग एक दूसरे की बातो को समझ पाते है| ठीक उसी प्रकार कंप्यूटर की भी अपनी भाषा होती है जिसे कंप्यूटर समझता है गणनाये करता है और परिणाम देता है| प्रोग्रामिंग भाषा कंप्यूटर की भाषा है जिसे कंप्यूटर के विद्वानों ने कंप्यूटर पर एप्लिकेशनों को विकसित करने के लिए Design किया है| पारंपरिक भाषा कि तरह ही प्रोग्रामिंग भाषाओँ के अपने व्याकरण होते है इसमें भी वर्ण, शब्द, वाक्य इत्यादि होते हैं|

प्रोग्रामिंग भाषाओ के प्रकार (Types of Programming Language)

प्रोग्रामिंग भाषा कई है | कुछ को हम समझते है तथा कुछ को केवल कम्प्यूटर ही समझता है | जिन भाषाओ को केवल कम्प्यूटर समझता है वे आमतौर पर निम्नस्तरीय भाषा (Low level Language) कहलाती है तथा जिन भाषाओ को हम समझ सकते है उन्हें उच्चस्तरीय भाषा (High level language) कहते है 

म्न स्तरीय भाषा (Low Level Language)

वह भाषाएँ (Languages) जो अपने संकेतो को मशीन संकेतो में बदलने के लिए किसी भी अनुवादक (Translator) को सम्मिलित नही करता, उसे निम्न स्तरीय भाषा कहते है अर्थात निम्न स्तरीय भाषा के कोड को किसी तरह से अनुवाद (Translate) करने की आवश्यकता नही होती है | मशीन भाषा (Machine Language) तथा असेम्बली भाषा (Assembly Language) इस भाषा के दो उदाहरण है| लेकिन इनका उपयोग प्रोग्राम (Program) में करना बहुत ही कठिन है | इसका उपयोग करने के लिए कम्प्यूटर के हार्डवेयर (Hardware) के विषय में गहरी जानकारी होना आवश्यक है | यह बहुत ही समय लेता है और त्रुटियों (Error) की सम्भावना अत्यधिक होती है | इनका संपादन (Execution) उच्च स्तरीय भाषा (High level language) से तेज होता है | ये दो प्रकार की होती है –

  1. मशीन भाषा (Machine Language)
  2. असेम्बली भाषा (Assembly Language)
  • मशीन भाषा (Machine Language)

कम्प्यूटर प्रणाली (Computer System) सिर्फ अंको के संकेतो को समझाता है, जोकि बाइनरी (Binary) 1 या 0 होता है | अत: कम्प्यूटर को निर्देश सिर्फ बाइनरी कोड 1 या 0 में ही दिया जाता है और  जो निर्देश बाइनरी कोड (Binary Code) में देते है उन्हें मशीन भाषा (Machine Language) कहते है | मशीनी भाषा (Machine Level Language) मशीन के लिए सरल होती है और प्रोग्रामर के लिए कठिन होती है | मशीन भाषा प्रोग्राम का रख रखाव भी बहुत कठिन होता है | क्योकि इसमें त्रुटीयो (Error) की संभावनाएँ अधिक होती है | Machine Language प्रत्येक Computer System पर अलग-अलग कार्य करती है, इसलिए एक कंप्यूटर के कोड दूसरे कंप्यूटर पर नही चल सकते|

  • असेम्बली भाषा (Assembly Language)

असेम्बली भाषा में निर्देश अंग्रेजी के शब्दों के रूप में दिए जाते है, जैसे की NOV, ADD, SUB आदि, इसे mnemonic code” (निमोनिक कोड) कहते है | मशीन भाषा की तुलना में असेम्बली भाषा को समझना सरल होता है लेकीन जैसा की हम जानते है की कम्प्यूटर एक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस (Electronic Device) है और यह सिर्फ बाइनरी कोड (Binary Code) को समझता है, इसलिए जो प्रोग्राम असेम्बली भाषा में लिखा होता है, उसे मशीन स्तरीय भाषा (Machine level language) में अनुवाद (Translate) करना होता है | ऐसा Translator जो असेम्बली भाषा (Assembly language) को मशीन भाषा (Machine language) में Translate करता है, उसे असेम्बलर (Assembler) कहते है |डाटा (Data) को कम्प्यूटर रजिस्टर में जमा किया जाता है और प्रत्येक कम्प्यूटर का अपना अलग रजिस्टर सेट होता है, इसलिए असेम्बली भाषा में लिखे प्रोग्राम सुविधाजनक नही होता है | इसका मतलब यह है कि दुसरे कम्प्यूटर प्रणाली के लिए हमें इसे फिर से अनुवाद करना पड़ता है |

उच्च स्तरीय भाषा (High level language) सुविधाजनक होने के लक्षणों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, इसका अर्थ यह कि ये भाषा मशीन पर निर्भर करती है | यह भाषा अंग्रेजी भाषा के कोड जैसी होती है, इसलिए इसे कोड करना या समझना सरल होता है | इसके लिए एक Translator की आवश्यकता होती है, जो उच्च स्तरीय भाषा के Program को मशीन कोड में translate करता है इसके उदाहरण है – फॉरटरैन (FORTRAN), बेसिक (BASIC), कोबोल (COBOL), पास्कल (PASCAL), सी (C), सी++ (C++), जावा (JAVA), VISUAL BASIC, Visual Basic.net HTML, Sun Studio आदि इसी श्रेणी (Category) की भाषा है इसको दो generation में बाँटा गया गई|

  1. Third Generation Language
  2. Fourth Generation Language
  • तृतीय पीढ़ी भाषा (Third Generation Language)

तृतीय पीढ़ी भाषाएँ (Third Generation Language) पहली भाषाएँ थी जिन्होंने प्रोग्रामरो को मशीनी तथा असेम्बली भाषाओ में प्रोग्राम लिखने से आजाद किया| तृतीय पीढ़ी की भाषाएँ मशीन पर आश्रित नही थी इसलिए प्रोग्राम लिखने के लिए मशीन के आर्किटेक्चर को समझने की जरुरत नही थी | इसके अतिरिक्त प्रोग्राम पोर्टेबल हो गए, जिस कारण प्रोग्राम को उनके कम्पाइलर व इन्टरप्रेटर के साथ एक कम्प्यूटर से दुसरे कम्प्यूटर में कॉपी किया जा सकता था| तृतीय पीढ़ी के कुछ अत्यधिक लोकप्रिय भाषाओ में फॉरटरैन (FORTRAN), बेसिक (BASIC), कोबोल (COBOL), पास्कल (PASCAL), सी (C), सी++ (C++) आदि सम्मिलित है |

  • चतुर्थ पीढ़ी भाषा (Fourth Generation Language)

Forth Generation Language, तृतीय पीढ़ी के भाषा से उपयोग करने में अधिक सरल है | सामान्यत: चतुर्थ पीढ़ी की भषाओ में विजुअल (Visual) वातावरण होता है जबकि तृतीय पीढ़ी की भाषाओ में टेक्सचुअल (Textual) वातावरण होता था | टेक्सचुअल वातावरण में प्रोग्रामर Source Code को निर्मित करने के लिए अंग्रेजी के शब्दों का उपयोग करते है | चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओ के एक पंक्ति का कथन तृतीय पीढ़ी के 8 पंक्तियों के कथन के बराबर होता है | विजुअल वातावरण में, प्रोग्रामर बटन, लेबल तथा टेक्स्ट बॉक्सो  जैसे आइटमो को ड्रैग एवं ड्रॉप करने के लिए टूलबार का उपयोग करते है| इसकी विशेषता IDE (Integrated development Environment) हैं जिनके Application Compiler तथा run time को Support करते है| Microsoft Visual studio and Java Studio इसके दो उदाहरण है|

लाभ (Advantages)

  • चतुर्थ पीढ़ी की भाषा को सीखना सरल है तथा इसमें सॉफ्टवेयर का विकास करना आसान है|
  • चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओ में टेक्सचुअलइंटरफेस (Textual Interface) के साथ-साथ ग्राफिकल इंटरफेस (Graphical Interface) भी होता है |
  • प्रोग्रामरो के लिए चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओ में विकल्प उपलब्ध रहते है क्योकि इसकी संख्या काफी बड़ी होती है |
  • चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओ में प्रोग्रामिंग कम स्थान लेती है क्योकि इस पीढ़ी की भाषा की एक पंक्ति पूर्ववर्ती पीढ़ी भाषाओ की कई पंक्तियो के समान होती है |
  • चतुर्थ पीढ़ी की भाषाओ की उपलब्धता कठिन नहीं है |

हानि (Disadvantages)

  • चतुर्थ पीढ़ी की भाषाएँ उच्च कंफिगरेशन के कंप्यूटरो पर ही संचालित हो सकती है|
  • इस पीढ़ी की भाषाओ के लिए विशेषज्ञता की कम आवश्यकता होती है | इसका अर्थ है की इसमें प्रोग्रामिंग आसान होने के कारण नौसिखिए भी सॉफ्टवेयर विकसित करने में सक्षम हो पाते है | परिणामस्वरूप, विशेषज्ञों का महत्व कम हो जाता है |
  • इस पीढ़ी में प्रोग्रामिंग भाषाओ की एक बड़ी श्रंखला 

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