Saturday, May 30, 2020

नेटवर्क क्या है ?

नेटवर्क आपस में एक दूसरे से जुड़े कंप्यूटरों का समूह है जो एक दूसरे से संचार स्थापित करने तथा सूचनाओं, संसाधनों को साझा इस्तेमाल करने में सक्षम होते हैं । किसी भी नेटवर्क को स्थापित करने के लिए प्रेषक, प्राप्तकर्ता, माध्यम तथा प्रोटोकॉल की आवश्यकता होती है । कम्प्यूटर के साधनों में भागीदारी करने के उद्देश्य से बहुत-से कंप्यूटरों का आपस में जुड़ना कम्प्यूटर नेटवर्किंग कहलाता है । कम्प्यूटर नेटवर्किंग की मदद से उपभोक्ता उपकरणों, प्रोग्रामों, संदेशों और सूचनाओं को एक ही जगह पर रहकर उनके साथ भागीदारी कर सकते हैं ।
नेटवर्क स्थापित करने के लिए मुख्य उपकरण निम्नलिखित है :
  • रिपीटर्स (Repeaters)
  • हब (Hub)
  • स्विच (Switches)
  • राउटर्स (Routers)
  • गेटवे (Gateways)
नेटवर्क के निम्नलिखित प्रकार हैं :

  1. PAN
  2. HAN
  3. CAN
  4. LAN
  5. MAN
  6. WAN

1. Personal Area Network (PAN क्या हैं)

Personal Area Network in Hindi
एक PAN नेटवर्क का चित्रात्मक मॉडल
PAN एक निजी नेटवर्क का प्रकार हैं. जब आप अपने दोस्त के स्मार्टफोन से कोई फोटों ले रहे होते हैं. तब आप PAN Network का ही इस्तेमाल करते हैं. यह अक्सर ब्लुटूथ डिवाईस में ज्यादा इस्तेमाल होता हैं. इसके अलावा Infrared भी इसी में शामिल होती हैं.
इस नेटवर्क के दौरान एक व्यक्ति अपने घर या ऑफिस में अपने स्मार्टफोन, कम्प्युटर, ,हैडफोन आदि को किसी एक डिवाईस (Gateway) से नियंत्रित करता हैं. और इनके बीच आपस में संसाधन साझा किए जा सकते हैं.  

2. Home Area Network (HAN क्या हैं)

Home Area Network भी एक प्रकार का निजी नेटवर्क होता हैं. मगर इसका दायरा व्यक्ति से निकलकर परिवार तक बढ जाता हैं. इस नेटवर्क की मदद से एक घर में उपलब्ध अन्य डिवाईसों जैसे Printers, Tablet, Speakers, Laptops आदि को आपस में कनेक्ट किया जाता हैं.
जब ये कनेक्शन यानि नेटवर्क स्थापित हो जाता हैं. तब आप आपके बगल वाले कमरे में रखे प्रिंट्रस से Print Out निकाल सकते हैं. अपने मन पसंद गाना चलाने के लिए स्मार्टफोन से स्पीकर को कनेक्ट कर सकते हैं. फाईल, अन्य डाटा शेयर कर सकते हैं.
यह नेटवर्क केबल और बिना केबल यानि वायरलेस हो सकता हैं. मगर इस प्रकार के नेटवर्क में वाई-फाई तकनीक का इस्तेमाल बेहतर रहता हैं.

3. Campus Area Network (CAN क्या हैं)

यन नेटवर्क शैक्षिक तथा सैन्य संस्थाओं में अधिक इसेमाल होता हैं. इसका दायरा संस्ता विशेष तक ही सीमित होता हैं. इसलिए इसे कैम्पस नेटवर्क कहते हैं. यह कुछ हद तक लोकल एरिया का ही भाग होता हैं.

4. Local Area Network (LAN क्या हैं)

जब एक सीमित स्थान जैसे इमारत, स्कूल, कॉलेज, कार्यालय, संस्थान, फैक्ट्री आदि में कम्प्युटरों को आपस में एक दूसरे से जोडा जाता हैं. तो इस नेटवर्क को लोकल एरिया नेटवर्क कहते हैं.
लैन नेटवर्क में इथरनेट और वाई-फाई तकनीक का इस्तेमाल ज्यादा किया जाता हैं. मगर इसमे केबल पर कम ध्यान दिया जाता हैं कामकाजी जगह पर ज्यादा बनाए जाते हैं. इसमे एक मुख्य कम्प्युटर यानि सर्वर होता हैं. जहाँ पर संस्था से संबंधित डाटा रखा रहता हैं. और इसे अन्य कम्प्युटरों से जोड दिया जाता हैं. अगर किसी कर्मचारी को फाईल चाहिए होती है तो वो उसे अपनी डेस्क से ही एक्सेस कर पाता हैं.
लोकल एरिया नेटवर्क अधिकतर निजी नेटवर्क होते हैं. इनकी स्पीड तेज होती हैं और ये ज्यादा सुरक्षित भी होते हैं. इन्हे बनाने की लागत भी कम होती हैं.

5. Metropolitan Area Network (MAN क्या हैं)  

यह नेटवर्क एक से ज्यादा PAN, LAN आदि नेटवर्कों से मिलकर बना होता हैं. इसका दायरा सैकडों किलोमीटर होता हैं. और यह एक बडे शहर को आपस में जोड सकता हैं.
MAN से एक शहर में मौजूद सभी छोटे-बडे नेटवर्कों को आपस में कनेक्ट करता हैं. और इसमें स्कूल, कॉलेज, कैम्पस, लैन नेटवर्क, सरकारी संस्थान आपस में एक जुडे रहते हैं.

6. Wide Area Network (WAN क्या हैं)

Wide Area Network in Hindi
WAN नेटवर्क का चित्रात्मक मॉडल
इंटरनेट Wide Area Network है. यह दुनिया का सबसे बडा नेटवर्क होता हैं. और इसका दायरा सबसे बडा होता हैं. इस नेटवर्क को LAN of LANs कहा जाता हैं.
WAN से बहुत सारे LAN, WAN जुडे रहते हैं. और ये आपस में डाटा शेयर करते रहते हैं. इसके जरिये आप दुनिया भर के किसी भी कम्प्युटर से सैकंडों मे जुड सकते हैं. और लाईव प्रसारण का आनंद ले सकते हैं.
इस नेटवर्क में बहुत सारी तकनीक, प्रोटोकॉल (TCP/IP, ATM, MPLS) का इस्तेमाल होता हैं. और अन्य छोटे नेटवर्कों को जोडने के लिए मध्यस्थो ISPs की भी जरुरत पडती हैं. इसलिए यह नेटवर्क अन्य सभी नेटवर्कों की तुलना में बहुत मँहगा होता हैं.

नेटवर्क का इतिहास (History of Network)

1960 के दशक के दौरान पॉल बैरन एवं डोनाल्ड डेविस नें दो कम्प्युटरों के बीच जानकारी साझा करने के उद्देश्य से पैकेट स्विचिंग (Packet Switching) की ओर कार्य प्रारंभ किया. तथा 1965 में इलेक्ट्रॉनिक टेलीफोन स्विच लॉच किया गया. जिसका उपयोग कम्प्युटर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता था.
1969 में ARPANET (Advance Research Project Agency Network) के पहले चार नोड्स मुख्य विश्वविद्यालयों के बीच 50kbit/s सर्किट के उपयोग से जुडे चुक थे. इस तरह अर्पानेट के बढते शोध तथा विकास ने सबसे मजबूत नेटवर्क अर्थात इंटरनेट का निर्माण किया.
1976 में ARCNET (टोकन-पार्सिंग) नेटवर्क बनाया गया. जिसे उपकरणों को शेयर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. ईथरनेट के विषय में 1973 में शोध किया गया तथा जुलाई 1976 में रोबोट मेटाकाफ तथा डेविड बोग्स ने अपने पेपर ईथरनेट (Distributed Packet Switching for Local Computer Network) को प्रकाशित कर इस नेटवर्क के सिद्धांत के बारे में बताया.
इंटरनेट के बढते विकास के कारण सन 1995 में ईथरनेट की ट्रांसमिशन गति 10Mbit/s से बढकर 100Mbit/s हो गई थी. तथा 1098 में यह बढकर एक गीगाबाईट हो चुकी थी. वर्तमान समय में ईथरनेट को LAN के नाम से भी जाना जाता हैं

Internet

इन्टरनेट क्या है ?

Internet एक महाजाल है। Internet दुनिया का सबसे बड़ा और व्यस्तम नेटवर्क है. Internet को हिंदी में ‘अंतरजाल‘ कहते है। अगर सीधे शब्दों में कहे तो दुनिया के कम्प्युटरों का आपस में जुड़ना ही Internet है । जब यह नेटवर्क (Internet) स्थापित हो जाता है तो हम एक विशाल जाल का हिस्सा हो जाते है जिसेे Global Network कहते हैं । और इस नेटवर्क से जुडें किसी भी कम्प्युटर में उपलब्ध कोई भी सूचना अपने कम्प्युटर में प्राप्त कर सकते है ।

इंटरनेट से जुडे जुए प्रत्येक कम्प्युटर की एक अलग पहचान होती हैं । इस विशेष पहचान (Unique Identity) को IP Address कहा जाता हैं । IP Address गणितिय संख्याओं का एक Unique Set होता हैं (जैसे 103.195.185.222) जो उस कम्प्युटर की लोकेशन को बताता हैं ।

IP Address को Domain Name Server यानि DNS द्वारा एक नाम दिया जाता हैं जो उस IP Address को Represent करता हैं । जैसे http://gk-hindi.in एक Domain Name हैं जो किसी कम्प्युटर लोकेशन का नाम हैं । जिसे डोमेन नेम सर्वर किसी IP Address यानि कम्प्युटर से जोड देते हैं ।

इस तरह से, इन्टरनेट का मतलब उच्चस्तरीय कम्प्यूटर का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ाव है । ये जुड़ाव नेटवर्क केबलों, टेलीफोन केबलों, माइक्रोवेव डिश, सैटेलाइट और अन्य प्रकार के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के द्वारा सम्भव किया जाता है । इन्टरनेट विश्व के विभिन्न नेटवर्कों से सम्बन्ध रखने वालों हजारों कम्प्यूटर का एक जुड़ाव है । इससे नेटवर्किंग के माध्यम से विश्व में किसी भी जगह से विभिन्न प्रकार की सूचनाओं में भागीदारी की जा सकती है ।

Internet के कुछ प्रमुख क्षेत्र जहाँ Internet का उपयोग किया जाता है :-

  • खोजने के लिए( To Search Information) :- Internet को विकसित ही इसलिए किया गया था । आज से पहले कभी भी इस प्रकार सूचनाए प्राप्त करना आसान नही था। लेकिन आज हम Internet के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने से जानकारीयाँ प्राप्त कर सकते है और वो भी कुछ सैकण्डों में। हम दुनिया के हर कोने की खबर घर बैठे अपने कम्प्युटर पर ले सकते है। Internet में सूचनाए खोजने के लिए Search Engines का उपयोग किया जाता है।

  • मनोरंजन के लिए (To Entertainment) :- Internet का उपयोग मनोरंजन के साधन के रूप में किया जाता है। मनोरंजन के क्षेत्र मे विकल्प असीमित है। इसके माध्यम से हम फिल्में, गाने, विडियों आदि को देख तथा सुन सकते है। पढने के शौकिन अपने मनपसंद लेखक को पढ‌ सकते है। इसके अलावा हर वक्त का मनोरंजन विडियो गेम कि दुनिया तो हमारे लिए हर वक्त खुली होती है ।

  • खरीदी के लिए( To Shopping) :- इसे ई-व्यापार (E-commerce) कहते है। Internet के माध्यम से बाजार को घर से ही देखा जा सकता है और अपना सामान खरीदा जा सकता है। हम Internet के द्वारा घर बैठे ही किस दुकान पर कौनसा सामान है और कौनसा नही तथा उस सामान के ढेरो विकल्प एक साथ देखकर पसंद से अपना सामान खरीद सकते है। इसके अलावा प्रचलित फैशन को जान सकते है।

  • शिक्षा के क्षेत्र में (In Education) :- इसे E-learning (ई-शिक्षा) कहते है. यह क्षेत्र तेजी से बढ रहा है। आज Internet के माध्यम से हम घर बैठे ही अपने लिए मनपसंद कॉलेज, स्कूल चुन सकते है। इसके अलावा हमारे पसंद के कोर्स किस कॉलेज में उपलब्ध है और उस कोर्स के बारे में सारी जानकारी यथा कोर्स की फीस, कोर्स का समयावधि आदि, यह जानकारी हम अपने कम्प्युटर पर प्राप्त कर कर सकते है। आज ई-लर्निंग का क्षेत्र काफि विकसित हो चुका है। हम घर बैठे ही दुनिया के बेहतरीन अध्यापको से पढ सकते है।

Thursday, May 28, 2020

ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है


ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है और इसकी विशेषताएं?

क्या आप जानते हैं ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है (What is Operating System in Hindi) अगर नहीं जानते तो कोई बात नहीं क्यों की आज के इस पोस्ट को पढ़ कर आप अच्छे से समझ जाएंगे. इसके साथ आप ये भी जान जायेंगे की ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार क्या क्या होते हैं (Types of operating system in Hindi) और ये काम कैसे करता है? इन सारे सवालो का जवाब ये पोस्ट पूरा पढते पढते आपको मिल जाएगा.

दोस्तों इंसान के शरीर में बहुत से पार्ट्स हैं जो ज़िंदा रहने के लिए जरुरी हैं. लेकिन आत्मा ऐसी चीज़ है जो न रहे तो इंसान का शारीर किसी काम का नही.जब तक आत्मा होती है पूरा शरीर काम करता है. भले ही कोई पार्ट काम करे या न करे, इंसान जिन्दा रहता है. ठीक उसी तरह कंप्यूटर में भी आत्मा की तरह ही एक चीज़ होती है जिसे हम ऑपरेटिंग सिस्टम कहते हैं. कंप्यूटर क्या है ये तो आपको मालुम ही है. इसमें भी बहुत से पार्ट्स होते हैं. लेकिन जब तक ये नहीं होगा कंप्यूटर चलेगा ही नही.

जिसके पास भी लैपटॉप या स्मार्टफोन है वो अक्सर android, windows, Linux, Mac इन शब्दों की चर्चा करते हैं. कंप्यूटर सिस्टम की बात करे तो इस में विंडोज 95 से लेकर  विंडोज 10 इत्यादि. सभी OS ही हैं. स्मार्टफोन प्रयोग करने वाले भी इस से अन्जान नहीं हैं. इस में भी एंड्राइड के version Jellybean, Kitkat से लेकर Oreo सभी OS ही हैं. जिन्हे आप भी जरूर जानते हैं. हमारे आपके जैसा आम आदमी भी स्मार्टफोन ख़रीदने जाता है तो एंड्राइड का लेटेस्ट version ही खरीदता है. तो चलिए अब ऑपरेटिंग सिस्टम क्या होता है और इसके कितने प्रकार होते हैं, ये जानते हैं.


ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है (What is Operating system in Hindi)



ऑपरेटिंग सिस्टम एक सिस्टम सॉफ्टवेयर होता है जिसे शार्ट में हम OS भी बोलते हैं. एक तरह से ये कंप्यूटर में आत्मा की तरह ही होता है. जिसके बिना कंप्यूटर बिलकुल काम नहीं कर सकता. ये कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के बिच सभी कामो का संचालन करता है. ये हार्डवेयर और उयोगकर्ता users यानि हमारे बिच एक तरह का इंटरफ़ेस होता है जो हमें एक दूसरे से जोड़ता है.

इसे यूँ कहे तो एक आधार है जिस की वजह से सारे सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर काम करते हैं. जितने भी हार्डवेयर होते हैं जैसे Keyboard, Mouse, Printer और सॉफ्टवेयर जैसे MS Office, Photoshop और chrome सभी ऑपरेटिंग सिस्टम पर ही काम करती है.

उदाहरण के लिए हम एक घर ही ले लेते हैं. अगर घर बनाने के लिए ज़मीन ही न हो तो फिर ईंट, सीमेंट, रेत रहने से भी क्या फायदा?  अब आप ही बताओ मुझे क्या आप घर बना लोगे बिना ज़मीन के? आपका जवाब होगा नहीं! ठीक उसी तरह आप कंप्यूटर चलाना चाहते है,  आपके पास mouse, keyboard, printer सभी चीज़ें है लेकिन OS install किया हुआ नहीं है, तो जी हाँ अपने सही समझा की कंप्यूटर on ही नही होगा.
अगर आप शॉप से जाकर नया कंप्यूटर लेते हैं तो उसमे विंडोज 7 या 10 इनस्टॉल कर के देते हैं. मान लीजिए अगर आप बिना विंडोज इनस्टॉल किये उसे घर ले जाते हैं फिर आप समझ ले की आपको शॉप दुबारा जाना पड़ेगा. क्यों की आपका कंप्यूटर इसके बिना on होगा ही नहीं.

MS-Word, VLC player ये सब एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर होते हैं. जिस पे हम काम करते हैं.  और जिस सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर काम करता है उसे ही सिस्टम सॉफ्टवेयर बोलते हैं. और सिस्टम सॉफ्टवेयर यहाँ OS ही है. अब आप समझ गए होंगे ये क्या है चलिए इसके बारे में कुछ और जानकारी लेते हैं.

ऑपरेटिंग सिस्टम के क्या फंक्शन हैं  – Function of Operating System in Hindi

इस की वजह से ही कंप्यूटर काम करता है लेकिन ये खुद कैसे काम करता है ये जानना भी जरुरी है. जब कंप्यूटर start होता है तब से लेकर कंप्यूटर के off होने तक सारे काम को अपने ऊपर संभाल कर ये कैसे चला पाता है. ये सोचने वाली बात है. तो चलिए जानते हैं की कंप्यूटर के फंक्शन क्या होते हैं (Function of Computer in Hindi).

  1. Memory management
  2. Processor management
  3. File management
  4. Device management
  5. Security
  6. Control over System Performance
  7. Job Accounting
  8. Error detecting Aids
  9. Coordination between other software and users

Memory Management

प्राइमरी मेमोरी और सेकेंडरी मेमोरी को मैनेज करने के प्रोसेस को ही मेमोरी मैनेजमेंट बोलते है. प्राइमरी मेमोरी जिसे हम RAM के नाम से जानते हैं जो की volatile मेमोरी होता है. और जो भी डाक्यूमेंट्स में काम करते हैं उसे ये temporary store करता रहता है. Main मेमोरी में words या फिर bits के बहुत सारे array होते हैं जिनमे से हर एक का अपना एक address होता है. Main memory जो होता है वो बहुत ही fast होता जिसे CPU से डायरेक्ट एक्सेस कर सकते हैं.

जब हम किसी सॉफ्टवेयर को डबल क्लिक कर के ओपन करते हैं तो उसका में memory में होना जरुरी है. एक हलकी झलक देख लेते हैं की ये और क्या क्या काम करता है.

  • प्राइमरी मेमोरी के हर स्टेप को ये रिकॉर्ड करता है. जैसे कितने मेमोरी का प्रयोग हो रहा है और कौन इस्तेमाल कर रहा है. जैसे हम chrome इस्तेमाल करते हैं तो वो कितना मेमोरी खा रहा है और साथ ही म्यूजिक प्लेयर चल रहा है तो वो भी अलग से RAM की कुछ मेमोरी को इस्तेमाल करेगा. ये सारी जानकारी को ये दिखाता है.
  • Multi programming में OS ये निर्णय लेता है की कौन से प्रोसेस को कितना मेमोरी और कब देना है.
  • जब अलग अलग प्रोग्राम को स्टार्ट किया जाता है तो प्रोग्राम के लिए मेमोरी को डिस्ट्रीब्यूट करता है.
  • जब कोई प्रोग्राम बंद होता है तो ये मेमोरी को वापस conserve करता है.

Processor Management

Multi programming environment में ऑपरेटिंग सिस्टम ये decide करता है की किस प्रोसेस को प्रोसेसर उपयोग करने के लिए देना है कब देना और कितने देर के लिए देना है. इस function को process scheduling भी बोलते है.  ये प्रोसेस मैनेजमेंट करने के लिए निचे दी गई activities को परफॉर्म करता है.

  • OS प्रोसेसर के सारे काम को track करता रहता है और हर प्रोसेस के status को रिकॉर्ड करता रहता है. इस टास्क को जो चलाते है उसे ट्रैफिक कंट्रोलर कहा जाता है.
  • येकिसी प्रोसेस के लिए प्रोसेसर को डिस्ट्रीब्यूट करता है.
  • जब कोई प्रोसेस होना बंद होता है तो उसे वापस ले लेता है.

Device Management

आपको ये तो मालुम होगा की हर इनपुट और आउटपुट डिवाइस इनस्टॉल करने के लिए साथ में ड्राइवर मिलता है. इन सभी इनपुट या एक्सटर्नल डिवाइस प्रयोग करने के पहले हमें ड्राइवर इनस्टॉल करना पड़ता है. अगर आप ड्राइवर इनस्टॉल नहीं करते हैं तो कंप्यूटर उस डिवाइस को पहचान नहीं पाता है. और इसकी वजह से डिवाइस काम भी नहीं करती.

वैसे लगभग विंडोज 7 तक के OS में ड्राइवर सभी devices के लिए इनस्टॉल करना होता था लेकिन अभी के लेटेस्ट विंडोज में बहुत कम devices के लिए ड्राइवर इनस्टॉल करने पड़ते हैं.

ये डिवाइस कम्युनिकेशन को उसके ड्राइवर के जरिये मैनेज करता है. चलिए देख लेते हैं की आखिर operating system device management कैसे काम करता है.

  • ये सभी devices को ट्रैक करता है. devices को मैनेज करने के लिए जिस प्रोग्राम को इस्तेमाल करता है उसे I/O कंट्रोलर कहा जाता है.
  • OS इसका भी निर्णय लेती है की कौन से प्रोसेस को डिवाइस कब और कितने समय के लिए देना है. उदाहरण के लिए हम फोटोशोप प्रोग्राम को लेते हैं. उसमे फोटो प्रिंट करने के लिए जैसे ही प्रिंट पर क्लिक करते हैं तो OS प्रिंटर जो की एक आउटपुट डिवाइस है उसे उस प्रोसेस करने के लिए थोड़ी देर के लिए execute करता है. जब फोटो प्रिंट हो जाता है तो फिर वो डिवाइस को वापस ले लेता है.
  • जितना हो सके उतनी ही देर डिवाइस को प्रयोग करता है जैसा की मैंने ऊपर के उदारण में बताया है.
  • Device जब काम पूरा कर लेता है तो फिर उसे inactive कर के रखता है.

File Management

फाइल को आसानी से प्रयोग करने के लिए हम फोल्डर बनाकर उसके अंदर रखते हैं. इससे हमें किसी भी फाइल को केटेगरी wise फोल्डर बनाकर रख के कभी भी उयोग करने में आसानी होती है.  Directory को ही हम फोल्डर भी बोलते है.

फ़ोल्डर के अंदर और भी फोल्डर और फाइल बनाकर रखते है। इस तरह से और भी काम कौन कौन से काम OS करता है ये हम जानते हैं.

  • ये हर इनफार्मेशन को ट्रैक करता है. इसके साथ ही फाइल का लोकेशन क्या है, फाइल कब बना कितने साइज का है , किस यूजर ने बनाया था ये सारी जानकारी भी ये रखता है. इस सारे प्रोसेस को जो प्रोग्राम परफॉर्म करता है उसे हम फाइल सिस्टम बोलते है.
  • OS ये decide करता है की किसको resource मिलेंगा.
  • Resource को आपस में बाँट देता है.
  • जब उपयोग में न हो तो resources को वापस ले लेता है.

Security

जब हम और कंप्यूटर उपयोग करते हैं तो चाहते हैं की सिर्फ हम ही उयोग कर सके. तो इसके लिए ये हमें सिक्योरिटी भी देती है. हम अपने लिए users क्रिएट कर सकते हैं और उसे पासवर्ड डाल कर सेफ भी रख सकते हैं. और अगर एक से ज्यादा यूजर हैं तो भी हम अपने लिए एक पर्सनल यूजर अलग से बनाकर उपयोग कर सकते हैं.

इससे ये फायदा होता है की सिस्टम तो वही होता है लेकिन हमारे पर्सनल डाटा को हम छुपा के, सुरक्षित और lock कर के आसानी से रख सकते हैं. ये ऑपरेटिंग सिस्टम हमें सारी सुविधाएं देता है.

Control over system performance

कभी कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ होगा की आपने किसी प्रोग्राम को शुरू करना चहा होगा और वो थोड़ी देर बाद शुरू हुआ हो. या फिर अपने किसी फाइल को स्टोर करने की कोशिस की होगी और वो बहुत देर तक प्रोसेस कर रही होगी. इन सभी परफॉरमेंस में होने वाले delays या देरी को OS रिकॉर्ड करता है और ये भी रिकॉर्ड करता है की किसी प्रोसेस को पूरा करने के लिए सिस्टम ने कितने देर बाद response किया.

Job Accounting

OS बहुत सारे काम तो करता है साथ ही ये भी काम करता है की किसी यूजर ने कंप्यूटर शुरू होने के बाद बंद करने तक कौन कौन से काम किये. और ये भी ट्रैक करता है की किस फाइल में काम किया है.

Error Detecting Aids

काम करते करते बहुत बार ऐसा होता है की सॉफ्टवेयर और प्रोग्राम हैंग हो जाते हैं. और ये भी होता है की कुछ error होने की वजह से बिच में ही सॉफ्टवेयर बंद हो जाता है। इन सारी errors को भी OS ट्रैक कर के रखता है.

Coordination Between other Softwares and Users

कंप्यूटर के अंदर जो प्रोग्रामिंग लैंग्वेज काम करते हैं उनके और users के दिए हुए कमांड्स और इनपुट के बिच में OS ही co-ordination बनाता है.जैसे जम हम “आ” टाइप करते हैं तो उसे सिस्टम (0,1) कोड के अनुसार समझता है की हमने क्या लिखा है. फिर उसे प्रोसेस कर के प्रोग्रामिंग लैंग्वेज समझता है फिर उसे समझ के आउटपुट डिवाइस के जरिये हमें शो करा देता है. ये सारे परफॉरमेंस के लिए बिच में जो काम करने का प्लेटफार्म देता है वो OS ही होता है.

ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार – Types of Operating System in Hindi

दुनिया में हर रोज़ कुछ न कुछ बदलाव होता रहता है. ठीक उसी तरह कंप्यूटर के OS भी बदलती रहते हैं. टेक्नोलॉजी और एडवांस होती जा रही है. अब तो ऐसा दौर आ चुका है की अभी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस पर भी साइंटिस्ट ने काफी सफलता पा ली है.

अब अगर OS में बदलाव न हो तो ये मुमकिन नहीं है. नासा तो अब मंगल तक पहुँच चुका है. तो आप इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं की क्या आप घर में जो ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करते हैं उसका इस्तेमाल राकेट साइंस में होता होगा? जी नहीं इसके लिए बहुत ही एडवांस OS जो अल्टीमेट फीचर्स वाले होते हैं उनका इस्तेमाल किया जाता है. इसी बात से आप समझ गए होंगे की ये सिर्फ एक तरह का नहीं होता.

इसकी उपयोग और जरूरत के अनुसार इसके अलग अलग प्रकार होते हैं. जैसी जरुरत वैसे इस का इस्तेमाल किया जाता है. तो चलिए जानते हैं की ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार कितने है.

  1. Batch operating System
  2. Network Operating System
  3. Time-Sharing Operating System
  4. Distributed Operating System
  5. Real-Time Operating System

Batch operating System

बैच ऑपरेटिंग सिस्टम में यूजर कंप्यूटर के साथ डायरेक्टली इंटरैक्ट नहीं करते हैं. इसमें एक ऑपरेटर होता है जो एक तरह के jobs को ग्रुप कर के जरूरत के अनुसार batches बना देती है. एक तरह के जरूरत वाले jobs को छांट कर के अलग अलग बैच में बनाना ऑपरेटर की जिम्मेदारी होती है.

Batch Operating System के फायदे के फायदे 

  • ये जानना बहुत मुश्किल होता है किसी जॉब को complete होने में कितना टाइम लगेगा, बैच सिस्टम के प्रोसेसर ही जानते हैं की लाइन में लगे हुए जॉब को कम्पलीट होने में कितना टाइम लगेगा.
  • इस सिस्टम को बहुत सारे यूजर शेयर कर सकते हैं.
  • Batch system idle time बहुत कम होता है.
  • इस सिस्टम में बार बार बड़े कामो को आसानी से मैनेज करने की capacity होती है.

Disadvantages of Batch System

  • कंप्यूटर और यूजर के बिच डायरेक्ट इंटरेक्शन नहीं होता.
  • कंप्यूटर ऑपरेटर्स को बैच सिस्टम के बारे में बहुत अच्छी जानकारी होना जरुरी है.
  • Batch system  को debug करना बहुत बड़ी प्रॉब्लम होती है.
  • ये महँगा होता है.
  • जब कोई जॉब एक बार फेल हो जाता है तो उसे दुबारा कम्पलीट करने के लिए लाइन में लगना पड़ता है. उसके कम्पलीट होने में काफी समय लग सकता है.

Network Operating System

ये सिस्टम सर्वर पर काम करते हैं। जिन में data, user, groups, application, security, और बाकि सभी नेटव्रकिंग सिस्टम को मैनेज करने की क्षमता होती है. किसी भी कम्पनी में अगर आप जायेंगे तो आपको वहाँ बहुत सारे कम्प्यूटर्स दिखेंगे जो एक प्राइवेट नेटवर्क के रूप में काम करते हैं. ये सारे कम्प्यूटर्स एक दूसरे से कनेक्टेड होते हैं. और इस तरह ये एक सर्वर के ऊपर काम करते हैं. इसमें आप फ़ाइल, प्रिंट, लोगिन किसी भी सिस्टम से एक्सेस कर सकते हैं.

उदाहरण: मैं एक ऑटोमोबाइल कंपनी में जॉब करता हूँ. यहाँ बहुत सारे कंप्यूटर सिस्टम हैं और सभी एक सर्वर से जुड़े हैं. और इस सर्वर पर स्टोर किये फाइल्स हम कहीं से भी खोल कर इस्तेमाल कर लेते हैं यानी किसी भी सिस्टम से हम सर्वर पर रखे फ़ाइल में काम कर लेते है. यहाँ तक की प्रिंट निकालने के लिए भी किसी भी सिस्टम से जाकर हम कॉमन प्रिंटर से प्रिंट निकल लेते हैं. इसके अलावा एक ही लोगिन ID को किसी भी सिस्टम में लोगिन के लिए इस्तेमाल कर लेते हैं.

Advantages

  • इसके centralized server बहुत स्थिर होते है
  • सारे सिक्योरिटी issue को सर्वर से ही मैनेज किया जा सकता है.
  • नए अपडेट को एक साथ सभी कम्प्यूटर्स में इम्प्लीमेंट आसानी से कर लिया जाता है.
  • आप किसी भी सिस्टम से दूसरे सिस्टम में VNC की मदद से रिमोटली एक्सेस कर के काम कर सकते हैं.

Disadvantages

  • इसमें उपयोग होने वाले सर्वर बहुत महंगे होते हैं.
  • हर तरह के ोपार्टिओं के लिए सेंट्रलाइज्ड सिस्टम पर देपेंद रेहना पड़ता है।
  • इसकी मेंटेनेंस और उपदटेस रेगुलरली होना जरुरी है।

Time Sharing Operating System

इस तरह के इस में हर टास्क को पूरा करने के लिए कुछ टाइम दिया जाता है ताकि हर टास्क smoothly काम कर सके. इसमे हर यूजर सिंगल सिस्टम का इस्तेमाल करता है तो इससे CPU को टाइम दिया जाता है. इस सिस्टम को Multitasking सिस्टम भी बोला जाता है. इसमें जो टास्क होता है वो सिंगल यूजर से भी हो सकता या फिर मल्टी यूजर से भी हो सकता है.

इस में हर टास्क को execute करने के लिए जितना टाइम लगता है उसे quantum बोलते है. हर टास्क को कम्पलीट करने के बाद ये फिर अगले टास्क को शुरू कर देता है.

Advantages

  • हर टास्क को पूरा करने के लिए बराबर मौका दिया जाता है.
  • सॉफ्टवेयर  के डुप्लीकेशन होने का बहुत कम चांस होता है.
  • CPU idle time को इसमें कम किया जा सकता है.

Disadvantages

  • इसमें reliability का प्रॉब्लम होता है.
  • हर एक को इसमें security और integrity का ख्याल रखना पड़ता है.
  • इसमे डाटा कम्युनिकेशन की प्रॉब्लम कॉमन है.

Time-sharing, operating system के उदाहरण हैं:- Unix

Distributed Operating System

कंप्यूटर टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस तरह का सिस्टम एक एडवांस टेक्नोलॉजी है.  जो हाल ही में शुरू किया गया है. इसे पूरी दुनिया में अपनाया गया है और हर कोने में इस्तेमाल किया जाने लगा है.

जब बहुत सारे autonomous यानि इंडिपेंडेंट कम्प्यूटर्स को जोड़कर एक सिंगल सिस्टम की तरह इस्तेमाल किया जाता है तो इसे डिस्ट्रिब्यूटेड ऑपरेटिंग सिस्टम बोला जाता है. ऐसा बिलकुल भी जरुरी नहीं की सारे कम्प्यूटर्स एक ही जगह पर हों. ये अलग अलग जगह रह कर भी कनेक्टेड हो सकते हैं.

आपने LAN और WAN तो जरूर सुना होगा. अगर नहीं जानते तो मैं बता देता हूँ. जब बहुत सारे कम्प्यूटर्स एक ही जगह पर होते हैं और आपस में कनेक्टेड होते हैं तो इसे LAN डिस्ट्रीब्यूट्स सिस्टम कहेंगे. और जब बहुत सारे कम्प्यूटर्स अलग अलग जगहो से एक साथ कनेक्टेड होते हैं उसे WAN डिस्ट्रिब्यूटेड सिस्टम बोलते हैं.

Advtantages:

  • अगर एक सिस्टम फेल हो जाता है तो पुरे नेटवर्क में कोई फर्क नहीं पड़ता है. सभी सिस्टम एक दूसरे से फ्री होते हैं डिपेंडेंट नहीं होते.
  • Email से डाटा एक्सचेंज की स्पीड बढ़ जाती है.
  • Resources shared होते हैं इसीलिए काम बहुत फ़ास्ट और बेस्ट होता है.
  • Data load होने में बहुत कम समय लगता है.
  • Data processing delay कम करता है

Real-Time Operating System

रियल टाइम ऑपरेटिंग सिस्टम ऐसा डाटा प्रोसेसिंग सिस्टम होता है जिसमे किसी इनपुट के लिए प्रोसेस और उसका रिस्पांस टाइम बहुत ही कम होता है. या यूँ कहे तो इस तरह के सिस्टम का इस्तेमाल करके हम किसी डाटा को इंटरनेट से लाइव देखते हैं. इस सिस्टम का इस्तेमाल कर के लंदन में बैठा एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर अमेरिका में किसी मरीज का ऑपरेशन कर लेता है. इसके लिए वो रोबोटिक हाथों का इस्तेमाल करते हैं. ये इसी सिस्टम की वजह से मुमकिन हो सका है

इसमें इनपुट करने के बाद आउटपुट होने तक के टाइम को Response time कहा जाता है.  इस तरह के सिस्टम का इस्तेमाल करने के कुछ उदारण ये हैं. Scientific experiments, Medical Imaging system, Industrial control system,Weapons system,Robot, Air traffic control system इत्यादि.

Real-Time 2 तरह के होते हैं.

1. Hard Real-Time Systems

ये ऐसा सिस्टम है जिसमे समय सीमा होती है. जितना टारगेट टाइम दिया होता है वो उसी टाइम में अपना टास्क पूरा कर लेता है. इसमें गलती होने की कोई गुंजाईश नहीं होती है.इस तरह के सिस्टम का इस्तेमाल Life save करने के लिए किया जाता है। जैसे parachutes, air bags, medical operation.तो अब आप समझ सकते हैं की इस तरह के सिस्टम कितने स्ट्रांग होते हैं.

2. Soft Real-Time Systems

इस तरह के सिस्टम में किसी तरह की समय सीमा नहीं होती है. अगर कोई टास्क चल रहा है तो वो ज्यादा टाइम भी ले रहा है तो इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं होता है. तो दोस्तों अब आप बहुत अच्छे तरीके से जान चुके हैं की ऑपरेटिंग सिस्टम कितने तरह के होते हैं. और बताये गए सभी प्रकार  काफी महत्वपूर्ण हैं.  ये समझने के लिए की ऑपरेटिंग सिस्टम कैसे काम करता है चलिए अब आगे जानते हैं ऑपरेटिंग सिस्टम के कुछ charactristics.

ऑपरेटिंग सिस्टम की विशेषताएं – Characteristics of Operating system

  • ऑपरेटिंग सिस्टम बहुत सारे सॉफ्टवेयर प्रोग्राम का एक ग्रुप होता है.जो आधार बनाता है जिसमे दूसरे प्रोग्राम रन कर सकते हैं
  • जितने भी सॉफ्टवेयर होते हैं उन्हें इनस्टॉल करने के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम का होना बहुत जरुरी है.
  • कंप्यूटर से कनेक्टेड सभी इनपुट और आउटपुट डिवाइस को ऑपरेटिंग सिस्टम ही कण्ट्रोल करता है.
  • ये यूजर और हार्डवेयर के बिच इंटरफ़ेस के रूप में काम करता है. यानि हमारे किये जाने वाले कामों को जब कीबोर्ड और माउस से हम इनपुट करते हैं तो ऑपरेटिंग सिस्टम इसे कण्ट्रोल करता है और फिर इसे आउटपुट डिवाइस के जरिये हमें शो कर देता है.
  • अगर हम अपने डाटा को सेफ्टी के साथ रखना चाहते हैं तो ये हमें सिक्योरिटी भी देता है. इसके लिए ये हमें बहुत सारे फीचर्स भी देता है.

Wednesday, May 27, 2020

What is server

Server क्या है और कैसे काम करता है?

क्या आपको मालुम है की Server क्या है(What is server in Hindi)? भले ही आप नहीं जानते होंगे की Server क्या होता है लेकिन आपने इसके बारे में जरूर सुना होगा. अगर अभी भी याद नहीं आ रहा है तो चलिये मैं याद दिला दूँ. आप स्टूडेंट्स होंगे तो जब भी आप एग्जाम देते होंगे और उसका रिजल्ट देखने जाते होंगे तो देखा होगा की आपकी रिजल्ट देखने वाली साइट खुल नहीं रही होती है. ऐसा में मैसेज आता है की server too busy. इससे आपको भी पता चल जाता है की इस पर लोड बढ़ गया है इसलिए रिजल्ट पेज खुल नहीं  रहा है.

हम जो वेबसाइट खोलते हैं रिजल्ट देखने के लिए वो इंटरनेट में स्टोर रहता है. रिजल्ट वाले दिन एक साथ ढेर सारे लोग एक ही वक़्त पर उस पेज में ऑनलाइन आते हैं और इस वजह से इतनी ट्रैफिक आने से रिजल्ट वाली वेबसाइट बहुत slow हो जाती है जिस्से result page बहुत ही धीरे धीरे लोड होता है. मेरे ख्याल से अब आपको समझ में आ गया होगा की आखिर आपने ये नाम पहले ही सुना हुआ तो मैं इसे एक और उदाहरण देकर समझाता हूँ आप अक्सर बैंक जाते होंगे.

कभी कभी बैंक जाने पर ये भी सुना होगा की लिंक फेल हैं.और आप उस दिन बैंक से जुड़ा कुछ भी काम नहीं करा पाते. ये भी ओवरलोड होने की वजह से ही होती है. दोस्तों अब तो आप अच्छे से समझ गए होंगे की आखिर हम किस बारे में बात करने वाले हैं. आज हम जानेंगे की ये कैसे काम करता है और ये कितने प्रकार के होते हैं(टाइप्स ऑफ़ सर्वर इन हिंदी)। इससे पहले चलिए जानते हैं की सर्वर क्या होता है(What is Server in Hindi)?

Server क्या है? (What is Server in Hindi)

सर्वर एक कम्पूटर, कंप्यूटर प्रोग्राम या डिवाइस होता है जो दूसरे कम्प्यूटर्स को इनफार्मेशन और डाटा भेजते है, जिसे हम आम भाषा में clients बोलते हैं. इस का मुख्य काम होता है इंटरनेट में जितने भी users होते हैं उन्हें सेवा देना. एक सिंगल सर्वर एक बार में बहुत सारे clients को डाटा और resource शेयर करती है और सेवा देती है.चलिए इसे अब एक उदाहरण के द्वारा समझते हैं.

 
Example:-

आप हर रोज़ फेसबुक और यूट्यूब जरूर इस्तेमाल करते होंगे. क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है की आप जो इतने फेसबुक Profile, वीडियो और फोटोज देखते हो वो सारे आपके फ़ोन में एक दम झट से कैसे आ जाते हैं. या फिर यूट्यूब में इतनी सारी मूवीज और वीडियोस कैसे तुरंत प्ले होकर चलने लगती है. ये सारा डाटा कहीं न कहीं स्टोर कर के रखा जाता है. तो जब हम किसी वीडियो को देखना चाहते हैं और उसे प्ले कर देते हैं या फिर किसी फेसबुक पेज को ओपन करते हैं तो यही सर्वर उस स्टोर किया हुआ डाटा को उसके लोकेशन से लेकर हमें हमारे App या फिर ब्राउज़र में तुरंत दिखा देता है. जब ये बहुत स्ट्रांग होता है तो वो जल्दी डाटा ट्रांसफर कर देता है. इस तरह हम कहीं से भी किसी वेबपेज और ऑनलाइन वीडियोस देख पाते हैं.


सर्वर एक तरह से कंप्यूटर ही होते हैं जो दुनिया के हर कोने में कहीं भी हो सकते हैं. वेब होस्टिंग कंपनियां अपनी सुविधा के अनुसार उन्हें इनस्टॉल करती है. इन की कैपेसिटी अलग अलग हो सकती है. जिस वेबसाइट में हर रोज़ बहुत ज्यादा ट्रैफिक होती है वो Dedicated Server का इस्तेमाल करते हैं.

आप अगर चाहे तो अपने कंप्यूटर को भी सर्वर बना सकते हैं. लेकिन आप ने देखा होगा की इंटरनेट में 24 घन्टे में किसी भी वक़्त अगर हम गूगल, फसबूक, यूट्यूब खोलते हैं तो ये हर वक़्त खुलता है. इस का मतलब ये कभी ऑफ नहीं होते. अब आप बताये की क्या आप अपने लैपटॉप और कंप्यूटर को 24*7 चालू रख सकते हैं? आपका जवाब होगा नही.  इंडसट्रिज, स्कूल, कॉलेज में हम इस का इस्तेमाल कर सकते हैं इसे नॉन-Dedicated या फिर LAN भी बोलते हैं.


Server कैसे काम करता है?

सर्वर कैसे काम करता है ये समझने के लिए हम एक example का इस्तेमाल करेंगे. मान लीजिये की आपने गूगल ओपन किया उसमे आप wtechni टाइप कर के सर्च करेंगे तो आपने जो भी लिखा है उस पर आधारित एक request generate हो जायेगा जो इंटरनेट के जरिये फेसबुक के सर्वर पर चला जाएगा. वहां पर आये हुए request यानि wtechni को सर्वर ढूंढ कर उसका डाटा आपके मोबाइल या कंप्यूटर में पहुंचा देगा. इस तरह आप wtechni का पेज अपने फ़ोन में देख सकेंगे.

ये इंटरनेट में होने वाले सभी कामों में हमारी मदद करता है. चाहे वो मूवी डाउनलोड करना हो या फॉर ऑनलाइन मूवी देखना हो. इस के अलावा ईमेल से मैसेज ओएहुँचना, ऑनलाइन voice call, video call इन सभी कामों को भी यही करता है. सारे डाटा को यही हम तक पहुंचाता है.

सर्वर जो काम करता है उस बीच बहुत से ऐसे फैक्टर्स हैं जो इस पुरे प्रोसेस से जुड़े होते हैं जैसे ip address, clients, domain name, ports और protocols.

Server कितने प्रकार के होते हैं (types of Server in Hindi)

काम के अनुसार अलग अलग सर्वर का इस्तेमाल किया जाता है. कुछ तो डेडिकेटेड होते हैं जो सिर्फ एक काम को करने के लिए होते हैं. या फिर बहुत सारे servers भी मिलकर सिर्फ एक task को करते हैं. चलिए अब जान लेते हैं की इस के कितने प्रकार होते हैं.

Web Servers

इंटरनेट पर जितने भी वेबसाइट हैं उनके सभी डाटा वेब servers में स्टोर किये होते है. वेब सर्वर वेब ब्राउज़र के माध्यम से वेब पेजेज को हमे दिखाती हैं. जब भी कोई यूजर वेब ब्राउज़र जैसे chrome, mozilla, internet explorer, ओपन कर के किसी वेबसाइट के address को डालते है तो वेब सर्वर्स के पास उसका रिक्वेस्ट जाता है और ये यूजर को वेब ब्राउज़र के माध्यम से डिवाइस में डाटा भेज देता है.

Email Server

इस तरह के सर्वर ईमेल के द्वारा मेसेजस को send और receive करने की सेवा देता है. इस में यूजर डाटा को स्टोर कर के रखा जाता है. साथ ही इस में बहुत स्पेस भी देती है जिसमे सभी मैसेज सेव रहते हैं. इस SMTP प्रोटोकॉल का इस्तेमाल किया जाता है.

Identity Server

Identity server , रजिस्टर्ड users लोगिन के लिए safety और सिक्योरिटी सेवा प्रदान करते हैं.

FTP Server

अक्सर वेबमास्टर अपने वेबसाइट में फाइल को कंप्यूटर से अपलोड करने के लिए FTP का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा अपने वेबसाइट के फाइल को हम अपने कंप्यूटर में भी डाउनलोड कर के store भी कर सकते हैं. FTP या file transfer protocol tool के माध्यम से हर तरह के फाइल को ट्रांसफर करने के काम आता है.

FAQ – Frequently Asked Questions

1. Server क्या होता है?

A. Server एक तरह से कंप्यूटर होता है जो दूसरे कम्प्यूटर्स और उपयोगकर्ता को सेवा प्रदान करता है. Server एक कंप्यूटर प्रोग्राम या फिर डिवाइस भी होते हैं जो सेवा देती हैं.

2. FTP क्या है?

A. FTP एक client प्रोग्राम या internet protocol होता है, जिसमे TCP/IP कनेक्शन के माध्यम से दो अलग अलग कम्प्यूटर्स के बीच फाइल्स या डाटा का आदान प्रदान होता है.

3. FTP का फुल फॉर्म क्या है?

A. FTP का फुल फॉर्म File Transfer Protocol होता है.

4.  FTP client को server से कैसे कनेक्ट करते हैं?

A. किसी वेबसाइट से डाटा को ट्रांसफर करने के लिए FTP client का प्रयोग करते हैं. इंटरनेट में फ्री में बहुत सारे FTP client सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं. सर्वर के IP address के जरिये server से कनेक्शन करने के बाद इसका इस्तेमाल कर के डाटा आदान प्रदान कर सकते हैं.

कुछ FTP client सॉफ्टवेयर के उदाहरण

  • Cyberduck
  • Filezilla
  • FireFTP
  • WinSCP
  • Transmit

5. SMTP  क्या है ?

A SMTP एक इंटरनेट स्टैण्डर्ड होता है जिसका इस्तेमाल ईमेल ट्रांसमिशन के लिए किया जाता है. Mail server ईमेल मैसेज को भेजने रिसीव करने के लिए SMTP का इस्तेमाल करते हैं.

6. SMTP का फुल फॉर्म क्या है?

A. SMTP का फुल फॉर्म Simple mail Transfer Protocol है

What is Software

सॉफ्टवेयर क्या है – What is Software 

Software Kya hai- What is software in Hindi


Definition of Software in English:

“Software is a set of instructions or programmes instructing a computer to do specific tasks.”

हिंदी में सॉफ्टवेयर की परिभाषा क्या है? ये भी जान लेते हैं.  सॉफ्टवेयर बहुत सारे instruction या programmes का सेट होता है जो कंप्यूटर को ख़ास काम करने के निर्देश देता है.

कंप्यूटर या स्मार्टफोन में हम जितने भी काम करते हैं उन हर एक काम के लिए अलग अलग SW होता है. उदाहरण के लिए हम रोज़ इंटरनेट use करते हैं उसके लिए Google chrome और UC browser use करते हैं. Documents बनाने के लिए MS word, फोटोज एडिट करने के लिए Photoshop, वीडियो चलाने के लिए VLC media player का इस्तेमाल करते हैं.

अब आप ही बताओ ये सब काम जिस के जरिये आप करते हैं वो सब क्या है? जी हाँ आपने सही समझा Google Chrome, Photoshop, PicsArt, UC browser. ये सभी SW हैं. कंप्यूटर और मोबाइल में जो operating system होता है वो भी प्रोग्राम है जिसके बिना कंप्यूटर start भी नहीं हो सकता.

सॉफ्टवेयर कंप्यूटर को किसी काम को perform करने के लिए  instructions देता है और कंप्यूटर उस काम को पूरा करता है. SW ऐसी चीज़ है जो physically available नहीं होता।  इसे हम टच नहीं कर सकते है. SW को बनाने के लिए High-level programming language का use किया जाता है. अब आपके मन में बहुत सारे सवाल आ रहे होंगे की आखिर ये programs या instruction  क्या होते हैं programming language का use कैसे करते हैं. तो चलिए जानते हैं इन सभी facts को और भी विस्तार में.

Instructions and Programmes

Instruction एक आर्डर होता है जो कंप्यूटर program, कंप्यूटर processor को देता है. हर instruction 0 और 1 के sequence से बना हुआ होता है. यही instruction कंप्यूटर को physical काम करने के लिए निर्देश देता है जैसे की (addition या जोड़ना ). जब हम दो नंबर्स को Add करना चाहते हैं तो कंप्यूटर के memory में save किया हुआ instruction काम करता है और हमारे दोनों नंबर्स को जोड़ कर हमे शो कर देता है. इस तरह अलग अलग काम के लिए अलग अलग instruction memory में save रहते हैं.

जब कई सारे instruction एक साथ मिलते हैं तो जाकर एक प्रोग्राम बनता है. ये समझने में आपको ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए की किसी सॉफ्टवेयर में अलग अलग function होते हैं. चलिए इसे एक उदाहरण से समझते हैं. MS Word अगर आप उसे करते होंगे तो आपको इसमें बहुत सरे फीचर्स मिलते हैं. जैसे नई फाइल बनाना, Picture add, Heading डालना, resume बना के उसे प्रिंट करना.

तो MS Word एक SW है जिसमे बहुत सारे programmes हैं. और हर एक प्रोग्राम छोटे छोटे instruction को मिलकर बना हुआ होता है. मान लीजिये हमे MS Word में फोटो से जुड़ा कोई  काम करना है. इसके लिए फोटो से जुड़ा एक प्रोग्राम लिखा हुआ रहता है. और फोटो से जुड़े काम जैसे फोटो के साइज को छोटा बड़ा करना फोटो को क्रॉप करना, फोटो के lighting को सेट करना. इनके लिए अलग अलग बहुत सारे instruction लिखे हुए रहते हैं.

अब आप instruction और प्रोग्राम क्या है समझ गए होंगे. तो अब आप ये जानना चाहते होंगे की आखिर ये instruction और प्रोग्राम कैसे लिखे जाते हैं. Instruction और प्रोग्राम लिखने के लिए programming language का use किया जाता है. तो चलिए जान लेते हैं की programming language क्या होता है? और इस से किसी instruction और प्रोग्राम को कैसे लिखा जाता है.

Programming Language

कंप्यूटर हमारी भाषा नहीं समझता. कंप्यूटर सिर्फ programming language को समझता है. तो हम अपनी बात कंप्यूटर को समझाने के लिए programming language का इस्तेमाल करते हैं. इसका मतलब आप समझ गए होंगे की programming language का उपयोग हम कंप्यूटर से बात करने के लिए करते हैं.

Programming language कीवर्ड्स के सेट, syntax, symbols aur semantics का उपयोग कर के instruction लिखने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. तो जब हमे कुछ काम करना होता है तो उसके अनुसार ही उसके लिए keywords, symbols और syntax का use कर के instruction लिखे जाते हैं जिससे एक प्रोग्राम बन जाता है. और बहुत सारे programmes तैयार कर के एक सॉफ्टवेयर बन जाता है. programming language बहुत सारे हैं जिनके इस्तेमाल से बड़े बड़े सॉफ्टवेयर बनाये जाते हैं. जैसे JAVA, Oracle, Fox Pro, DBase, COBOL, MySQL, PHP, .NET अलग अलग programming langauge हैं.

सॉफ्टवेयर कैसे बनाते हैं?

हम पहले ही ये जान चुके हैं की सॉफ्टवेयर क्या है. इसको बनाने के लिए programming language का नॉलेज होना बहुत जरुरी है. क्यों की SW बहुत सारे instruction और प्रोग्राम्स का सेट होता है. इसके अंदर जरुरत के अनुसार function के लिए instruction के रूप में codes लिखे जाते हैं. ये प्रोग्रामर ही कर सकते हैं. जिन्हे programming language का अच्छा ज्ञान होता है.

जो programming language की पढाई कर के knowledge रखते हैं वो सॉफ्टवेयर Developer यानि आईटी कम्पनीज में जॉब करते हैं. जैसा SW की जरुरत होती है उसके अनुसार programmers का ग्रुप बनाकर एक SW में मिलकर काम करते हैं.

तो इस तरह एक अकेला प्रोग्रामर भी SW बना सकता है लेकिन इसमें काफी टाइम लगता है. लेकिन group of programmers इसी काम को जल्दी कर लेता है. कम्पनियां एक फिक्स टाइम दे देती है की जिस डेट में उस प्रोजेक्ट को पूरा कर लेना होता है. सॉफ्टवेयर बनाने वाली आईटी कंपनियों में Infosys, TCS और WIPRO बहुत फेमस हैं.

सॉफ्टवेयर के प्रकार क्या है – Types of Software in Hindi

हम रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में बहुत सारे SW का इस्तेमाल कर के अपना काम चुटकी बजाकर कर लेते हैं. चाहे वो सिंपल कैलकुलेटर हो या फिर IRCTC App का use कर के घर बैठे टिकट बुक करना हो. हर काम में हम SW का ही सहारा लेते हैं. लेकिन ये सॉफ्टवेयर कितने प्रकार के होते हैं?  तो मैं बता दूँ की सॉफ्टवेयर 2 प्रकार के होते हैं.

  1. System Software
  2. Application Software

सिस्टम सॉफ्टवेयर क्या है – System Software in Hindi

सॉफ्टवेयर जिसकी मदद से कंप्यूटर काम करता है. यानि इन सॉफ्टवेयर के बिना कंप्यूटर खुद काम नहीं कर सकता वैसे SW को सिस्टम सॉफ्टवेयर बोलते हैं.  सिस्टम सॉफ्टवेयर कंप्यूटर और इसके अलावा सभी इनपुट और आउटपुट devices को भी चलाने के लिए काम करता है. जैसा की आप कंप्यूटर में कोई प्रिंटर कनेक्ट करते हैं तो उसके लिए ड्राइवर इनस्टॉल करना पड़ता है. जिसकी वजह से कंप्यूटर उस डिवाइस के साथ जुड़ पाता है और उसे भी काम करने में मदद करता है.

सिस्टम सॉफ्टवेयर के बिना कंप्यूटर खुद भी नहीं चल सकता और न ही उससे जुड़ा कोई हार्डवेयर जैसे इनपुट और आउटपुट डिवाइस काम कर सकता है. जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम Mac OS, Linux, Android, Windows 7 , Windows 8 ये सभी ऑपरेटिंग सिस्टम हैं. इन के बिना कंप्यूटर या मोबाइल ON भी नहीं हो सकता.

सिस्टम SW एक प्लेटफार्म है जिसके जरिये सारे devices काम करते हैं. सिस्टम सॉफ्टवेयर जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम के ऊपर हम दूसरे SW इनस्टॉल कर सकते हैं. जिस पर normally हम काम करते हैं. ये भी डिफरेंट types के होते हैं तो चलिए जानते हैं विस्तार से.

Operating System

ऑपरेटिंग सिस्टम अगर कहा जाये की ये कंप्यूटर की आत्मा है तो गलत नहीं होगा. जिसके बिना कंप्यूटर हार्डवेयर किसी काम के नहीं. ऑपरेटिंग सिस्टम ही वो जरिया है जिसकी मदद से हम कंप्यूटर के हर हार्डवेयर तक पहुँच पाते हैं. या फिर हार्डवेयर को काम करने के लिए निर्देश दे पाते हैं.

ऑपरेटिंग सिस्टम यूजर और कंप्यूटर के बिच इंटरफ़ेस यानि एक ब्रिज की तरह काम करता है. जैसे की Windows 10 कंप्यूटर का एक ऑपरेटिंग सिस्टम है. इस तरह के कई ऑपरेटिंग सिस्टम होते हैं. एंड्राइड मोबाइल के लिए use होने वाला सबसे पॉपुलर ऑपरेटिंग सिस्टम है. ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने वाली फेमस कम्पनिया Microsoft, Google और Apple हैं.

Device Drivers

मैंने आपको पहले ही बताया है की किसी भी इनपुट/आउटपुट डिवाइस को कंप्यूटर से कनेक्ट करने के लिए ड्राइवर इनस्टॉल करना पड़ता है. ड्राइवर्स ऑपरेटिंग सिस्टम को बताता है की डिवाइस क्या है और उसे पहचानने में मदद करता है. ड्राइवर्स के बिना कंप्यूटर का OS किसी भी हार्डवेयर को सपोर्ट नहीं कर पाता.

Language Translators

Transaltor एक कंप्यूटर प्रोग्राम होता है High और Low level language को machine language में translate करता है. जैसे assambler, interpreter और compiler ये कुछ translators हैं. Assambler low level language को translate करता है. जब की compiler हाई लेवल लैंग्वेज को translate करता है और interpreter line by line एक एक कर के translate करता है. इसके कुछ उदाहरण हैं C++, Java, COBOL.

Utility Programs

Utility program सिस्टम सॉफ्टवेयर होते हैं जो कंप्यूटर का विश्लेषण, configuration, optimization और maintain करने के लिए use किये जाते हैं. ये कंप्यूटर infrastructure को सपोर्ट करता है. ये directly task को perform करते हैं जिससे users को सपोर्ट मिलता है. इसके उदाहरण हैं Antivirus, Memory testers, Network utilities, Screensavers,  Disk checkers, Backup SW ये सभी प्रोग्राम्स कंप्यूटर को किसी भी तरह से सपोर्ट ही करते हैं.

एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर क्या है – Application Software in Hindi

कंप्यूटर बनाने का मुख्य उद्देश्य क्या है? ये किस लिए बनाया गया. जी हाँ ये हमारे काम को आसान करने के लिए बनाया गया है. एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर ऐसे SW होते हैं जिन पर हम अपना काम करते हैं. जबकि सिस्टम सॉफ्टवेयर बैकग्राउंड में काम करते हैं. जिसकी वजह से एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर उसके ऊपर सपोर्ट कर पाते हैं.

तो कुल मिलकर आप ये समझ ले की जिस SW से कंप्यूटर काम करता है और जो बैकग्राउंड में run कर के कंप्यूटर को चलता है वो सिस्टम सॉफ्टवेयर है. जबकि वैसे SW जिस पर हम और आप काम करते हैं उसे एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर बोलते हैं.

Application SW भी run करने के लिए सिस्टम SW पर निर्भर करते हैं. हम जो SW हर दिन use  करते हैं उसे मोबाइल के लिए Apps के नाम से भी जानते हैं.  ये एक तरह से हमारी ज़रूरत को पूरा करता है. तो चलिए जानते हैं की एप्लीकेशन SW कितने तरह के होते हैं.

Word Processing Software

डॉक्यूमेंट से जुड़े सारे काम करने के लिए word processing software का इस्तेमाल करते हैं. इस तरह के SW ज़्यादातर ऑफिस  में इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे SW का उपयोग किसी भी डॉक्यूमेंट को create कर सकते हैं. उसमे सुधार करने के लिए उसे एडिट कर सकते हैं. Microsoft office word processing के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग होता है. इसके अलावा Wordpad और Notepad का भी प्रयोग करते हैं.

Database Software

इस तरह के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हम डेटाबेस को create और manage करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसमें हम बहुत सारी जानकारी को एक साथ रख कर उसे मैनेज कर सकते हैं. इसको हम शार्ट में DBMS यानि database Management System भी कहते हैं. DBMS के रूप में use होने वाले SW Fox Pro, DBase, MS-Excel, Oracle हैं.

Multimedia Software

हम जो हर रोज़ गाने सुनते हैं और वीडियोस देखते हैं उसके लिए कंप्यूटर में हम बहुत सारे multimedia SW का इस्तेमाल करते हैं. अलग अलग extension के लिए हम अलग अलग multimedia players SW होते हैं. इसके कुछ उदाहरण Windows media player, VLC Media player, KM Player हैं.

Presentation Software

जब हमे project related कुछ काम करना होता है और उसे दुसरो लोगो के सामने शो करना होता है. तो ऐसे में हम presentation SW का इस्तेमाल करते हैं. presentation सॉफ्टवेयर में हम एक एक टॉपिक के लिए अलग से slides बनाकर उसे अपने clients को शो करते हैं. जैसे Microsoft Powerpoint, Keynotes इस के लिए use होने वाले SW हैं.

Educational Software

ऐसे केटेगरी के सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हम अपनी पढाई के लिए करते हैं. इस के अंतर्गत Dictionaries Encarta, Britannica Mathematical, MATLAB, Google Earth, NASA World wind आते हैं.

Internet Browser

दुनिया में हर रोज़ बहुत सारे लोग इंटरनेट से जानकारी निकालते हैं. इंटरनेट एक्सेस करने के लिए जिस SW या एप्लीकेशन का प्रयोग करते हैं उसे वेब ब्राउज़र बोला जाता है. कंप्यूटर और मोबाइल जैसे हर तरह के प्लेटफार्म के लिए browser का इस्तेमाल करते हैं. Google Chrome, UC browser, Mozilla Firefox, Internet Explorer Internet browser के उदाहरण  हैं.

Designing Software

ग्राफ़िक डिजाइनिंग और मल्टीमीडिया रिलेटेड डिजाइनिंग के लिए हम डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हैं. इसमें घर का नक्शा, animation, मशीन डिज़ाइन इत्यादि काम करते हैं. इस तरह की केटेगरी में जो सॉफ्टवेयर आते हैं उसके कुछ उदाहरण ये हैं जैसे Auto CAD, MAYA 3D, SolidWorks etc.

सॉफ्टवेयर कैसे ख़रीदे – How to Purchase Software in Hindi

सॉफ्टवेयर को हम कई तरह से खरीद सकते हैं.

Shareware –  Shareware में सॉफ्टवेयर को फ्री या ट्रायल के रूप में बांटा जाता है जिसमे कुछ वक़्त के लिए फ्री में इस्तेमाल करने दिया जाता है उसके बाद लाइफटाइम यूज़ करने के लिए पैसे चुकाने पड़ते हैं.

Liteware – ये भी एक तरह का shareware होता है जिस में सिर्फ कुछ features दिए जाते हैं. अगर आपको सारा feature चाहिए तो फिर आपको उस सॉफ्टवेयर का premium version पैसे देकर खरीदना होगा.

Freeware – इस तरह से सॉफ्टवेयर को बिलकुल फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं लेकिन इस में restriction होता है.

Public Domain Software – इस तरह के सॉफ्टवेयर बिना किसी retriction के डाउनलोड कर सकते हैं.

Open Source – इस में source code furnished कर दिया जाता है जिस में यूजर इस बात की सहमति करते हैं improvements limit नहीं करता है.

Monday, May 25, 2020

what is excel


What is Excel? 

Excel एक application software program है जिसे Microsoft द्वारा बनाया गया है और चुकी Microsoft को ‘MS’ के नाम से जानते है और आप सुनते होंगे की लोगो को कहते होंगे MS Excel.

Microsoft का सबसे popular software program है और Microsoft office और Excel उसी का हिस्सा है. इसे आप Spreadsheet भी कहते है और यहाँ पर row और column के माध्यम से यहाँ पर कोई भी कैलकुलेशन किया जा सकता है. आप Excel spreadsheet की मदद से किसी भी data को analysis, और visualize किया जा सकता है.

आज के समय में यह सबसे popular spreadsheet program है जो की WindowsAndroid और iOS तीनो platform के लिए available है और यह accounting से लेकर data analysis तक के सभी काम किया जा सकता है.

अपने इसमें एक नाम सुना होगा ‘Spreadsheet’ शायद आपके लिए यह नया हो लेकिन excel एक spreadsheet है और यह किसी भी data को row और column में organize करता हैं. अगर अपने कभी एक्सेल को open किया होगा तो देखा होगा की इसमें आपको sheet में हमेशा table देखने को मिलता है.

Components of MS Excel:

इसके अपने कुछ महत्वपूर्ण component होते है यहाँ पर मैंने कुछ basic components के बारे में बताया है.

Workbook: एक्सेल की पूरे spreadsheet को workbook भी कहा जाता है जिसमे बहुत से sheet हो सकते है.

Cell: यह सबसे smallest और सबसे popular part होता है excel में जो भी data है वो cell में ही store होते है और सारा calculation भी है cell के ऊपर होता है.

Columns: जितने भी vertical cell होते है उन्हें column के नाम से जानते है और इन्हे excel में ABCD….XYZ में नाम किया जाता है.

Rows: जो horizontal cells होते है उन्हें row के नाम से जाना जाता है और इन्हे 1,2,3…. के नाम से दर्शाया जाता है.

Title Bar: यह शीट का सबसे ऊपर का हिस्सा होता है जिसमे sheet का नाम लिखा होता है.

File Menu: यहाँ पर सभी जरुरी menu मिल जाते है जैसे की Save, Save As, Open, New, Print, Excel Options, Share, etc.

Ribbon Tab: इसमें Excel के सभी जरुरी menu, function और features मिल जाते है. Ribbon excel का सबसे जरुरी हिस्सा होता है और अगर ये excel में ना रहे तो इसमें काम करना बहुत मुश्किल हो जायेगा.

Microsoft Excel Basic Functions:

Excel में बहुत से functions होते है जिनका इस्तेमाल calculation के लिए किया जाता है और इन्हे की वजह से बड़े से बड़े data को आसानी से analysis किया जा सकता हैं.

SUM: इस function का इस्तेमाल दो या दो से अधिक cell values का SUM पता कर सकते है.

COUNT: यह cell में मौजूद सभी numeric cell values को count किया जाता है.

AVERAGE: यह cell में मौजूद सभी numeric values का average पता करने के लिए इस्तेमाल किया जाता हैं.

MS Excel में क्या सीखना चाहिए?

आप सभी ने excel sheet जरूर बनायी होगी और Rows & Column colorful भी बनाया होगा लेकिन excel केवल normal sheet बनाने के लिए नहीं है इसमें बहुत से advance features है जो की बड़े-बड़े data को analyze किया जा सकता है और अलग-अलग informative graph में visualize किया जा सकता है.

अगर आप excel को इस तरह learn करना चाहते है की आप अपने career को बेहतर बना पाए तो आपको इसके advance tactics learn करना होगा.

VLOOKUP: Excel में आपको LOOKUP, HLOOKUP और VLOOKUP तीन function मिलते है जो की एक ही तरह के task अलग-अलग Condition के perform करना होता है.

VLOOKUP function का इस्तेमाल किसी column के data को lookup और retrieve करने के लिए होता है. इसके आगे लिखा V = Vertical,होता हैं. यानि यह vertical value को देखता हैं.

Syntax
=VLOOKUP (value, table, col_index, [range_lookup])

Macros: Excel macro एक action होता है उसे आप record करके बार-बार इस्तेमाल कर सकते है यह बहुत time बचाता है. यानि अगर आसान भाषा में कहे तो अगर आप sheet पर कोई काम करते हैं तो उसे रिकॉर्ड बार-बार इस्तेमाल कर सकते है. इसका इस्तेमाल करने के दो तरीके हैं coding और visual तरीके हैं लेकिन coding बेहतर माना जाता है.

VBA: VBA जिसका नाम है Visual Basic Application और यह एक program हैं जिसका इस्तेमाल Macro बनाने के लिए होता है और इसके माध्यम से किसी भी तरह के problem को solve किया जा सकता है. VBA के माध्यम से किसी भी excel task को automate किया जा सकता है और Excel को एक powerful analytics tool बनाया जा सकता है.

Pivot: यह excel एक और powerful feature है जिसके माध्यम से large date set को summarize और visualize कर सकते है यानि यह एक normal business intelligence tool बना देता है excel को.


.

Saturday, May 23, 2020

पीपीएफ अकाउंट की पूरी जानकारी


पीपीएफ अकाउंट की पूरी जानकारी

जब भी हम किसी फाइनेंशियल प्लानर से Safe Investment की बात करते हैं तो वो कहता है पीपीएफ अकाउंट (PPF Account) खुलवा लीजिए। किसी अनुभवी आदमी से सलाह मांगते हैं तो वो PPF Scheme को सबसे भरोसेमंद बताता है। Tax consultant भी कहता है कि इससे बढ़िया Tax Saving होती है। लेकिन अगर ये स्कीम इतनी अच्छी है तो कहीं इसकी hoarding क्यों नहीं दिखाई देती है। टीवी पर इसका advertisement क्यों नहीं आता है और तो और बैंक वाले कभी इसकी चर्चा भी नहीं करते हैं।

आपका कन्फ्यूज होना natural है। लेकिन हम आपको इस तरह confuse नहीं करेंगे। क्योंकि इस पोस्ट में हम आपको पीपीएफ से जुड़ी हर छोटी बड़ी बात बताएंगे। Interest Rate से लेकर Lock-in-Period के बारे में बताएंगे और ये भी बताएंगे कि इस अच्छी स्कीम के बारे में कोई प्रचार क्यों नहीं होता है।

पीपीएफ स्कीम क्या है? What is PPF Scheme

पीपीएफ यानी Public Provident Fund हिन्दी में इसे लोक भविष्य निधि कहते हैं। यह एक ऐसी सेविंग स्कीम है जो अच्छे ब्याज के साथ-साथ टैक्स सेविंग भी कराती है। इस योजना को खुद सरकार चलाती है और वही ब्याज भी देती है।

1968 में भारत सरकार ने Public Provident Fund की स्थापना की थी। उद्देश्य यह था कि unorganised क्षेत्र के जिन कर्मचारियों के लिए, EPF, Pension आदि की सुविधा नहीं है उन्हे भी अपने भविष्य के लिए पैसा बचाने का मौका मिले। सरकार ने पीपीएफ को हर तरह के टैक्स से मुक्त रखा ताकि  ज्यादा से ज्यादा लोग इस योजना को अपनाएं।

पीपीएफ स्कीम को सरकार अपने पोस्ट ऑफिस और बैंकों के जरिए चलाती है।

PPF account investment

पीपीएफ एकाउंट के लिए जरूरी अर्हताएं व निवेश सीमा [2020]
Eligibility And Investment Limit of PPF

PPF से जुड़ी सबसे अच्छी बात यह है कि इसे देश का कोई भी नागरिक खुलवा सकता है। चाहे आप serviceman हों, businessman हो या किसान, इसमें अपना account खोल सकते हैं। यहां तक​ कि इसमें age limit का भी कोई बंधन नहीं है। ​आप अपने बच्चे के लिए भी PPF Account खुलवा सकते हैं।

लेकिन, यह ध्यान रखें कि आप अपने नाम सिर्फ एक PPF Account ही खुलवा सकते हैं। पहले से आपके नाम कोई PPF Account होने पर आप न तो अपने नाम और न ही किसी के साथ joint account खोल सकते हैं।

आप अपने जीवनकाल में कभी भी अपने नाम पर दूसरा account नहीं खोल सकते। अगर कभी आपके नाम पर कभी कोई दूसरा PPF Account पाया गया तो फिर दूसरा एकाउंट तुरंत deactivated हो जाएगा। उस खाते में deposit amount पर ब्याज भी नहीं मिलेगा।

एनआरआई नहीं खोल सकते पीपीएफ एकाउंट

NRI Cannot Open PPF Account

NRI यानी अनिवासी भारतीय को पीपीएफ एकाउंट खुलवाने की सुविधा नहीं है। लेकिन, अगर आपने भारत का citizen रहते हुए PPF Account खुलवाया था तो उसे आप अकाउंट की अवधि (15 साल) पूरी होने तक इसे continue रख सकते हैं।

NRI के लिए पीपीएफ के नए नियम के मुताबिक खाता के 15 साल पूरा होते ही इस खाते से आप तुरंत पूरा पैसा निकालना होगा। लेकिन अगर आप पैसा नहीं निकालेंगे तो सेविंग अकाउंट के दर पर ब्याज मिलेगा।

न्यूनतम और अधिकतम निवेश
Minimum And Maximum Investment

पीपीएप अकाउंट में हर साल कम से कम पांच सौ रुपए जमा करना जरूरी है। जबकि इस अकाउंट में एक साल के दौरान ज्यादा से ज्यादा डेढ़ लाख रुपए जमा किए जा सकते हैं।

ध्यान रखिए पीपीएफ का हिसाब किताब वित्त वर्ष के हिसाब से चलता है। मतलब इसका एक साल एक अप्रैल से शुरू होकर अगले साल इकतीस मार्च को खत्म होता है।

क्या बच्चे और पत्नी के खाते में पैसा जमा करके लिमिट पार कर सकते हैं?

अब बहुत से लोग ये सवाल पूछते हैं कि मान लीजिए एक खाते में डेढ़ लाख रुपए से ज्यादा नहीं जमा कर सकते हैं लेकिन क्या अपनी पत्नी और बच्चों के पीपीएफ अकाउंट में एक्स्ट्रा पैसा जमा किया जा सकता है?

इसका जवाब है नहीं। यहां ये देखा जाएगा कि पैसे का स्रोत क्या है। अगर बच्चे और पत्नी की अपनी कमाई नहीं है तो उनकी सेविंग असल में आपकी ही सेविंग है। और इसलिए डेढ़ लाख की ये जो लिमिट है वो सभी खातों में कुल जमा पैसे पर लागू होगी।

लेकिन आप ऐसा भी नहीं कर सकते हैं कि किसी एक अकाउंट में पांच सौ रुपए जमा करके ये मान लें कि अब बाकी में जमा करने की जरूरत नहीं है। मिनिमम जमा की शर्त हर अकाउंट पर अलग-अलग लागू होगी। मतलब हर अकाउंट में हर साल कम से कम पांच सौ रुपए जमा करने होंगे।

न्यूनतम रकम नहीं जमा कर पाए तो?

ऐसा हो सकता है कि किसी साल आप अपने पीपीएफ अकाउंट में न्यूनतम पांच सौ रुपए नहीं जमा कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में आपका पीपीएफ खाता इनएक्टिव हो जाएगा। इसे एक्टिव कराने के लिए आपको छूटे हुए साल के लिए कम से कम पांच सौ रुपए जमा करने होंगे।

इतना ही नहीं आपको हर एक साल की देरी के लिए पचास रुपए की पेनाल्टी भी जमा करनी होगी। इसके बाद ही आपका खाता फिर से एक्टिव होगा।

हालांकि खाता इनएक्टिव होने के बावजूद आपकी जमा रकम पर ब्याज मिलता रहेगा। उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

पीपीएफ खाते में कितने बार पैसा जमा कर सकते हैं ? Frequency of PPF Deposit

वैसे ये सवाल ही नहीं आना चाहिए। क्योंकि आमतौर पर किसी भी स्कीम में पैसा कितने बार जमा किया जाए इसकी कोई limit नहीं होती है। आप सेविंग अकाउंट में चाहे जितनी बार पैसा जमा कीजिए या निकालिए। म्यूचुअल फंड स्कीम में भी ऐसी कोई लिमिट नहीं है।

लेकिन पीपीएफ अकाउंट में आप एक साल के अंदर 12 बार से ज्यादा पैसा नहीं जमा कर सकते थे। शुरू से ही पीपीएफ में ये नियम था। लेकिन 2019 में नियम बदले और अब इस लिमिट को खत्म कर दिया गया है। अब आप पीपीएफ अकाउंट में चाहे जितनी बार पैसा जमा कर सकते हैं।

ppf account hindi

पीपीएफ अकाउंट लॉक इन पीरियड | Maturity of PPF Scheme

पीपीएफ स्कीम की मैच्योरिटी का वक्त बहुत लंबा होता है। इस स्कीम में खाता खुलवाने के 15 साल बाद पैसा वापस मिलता है।

इंश्योरेंस और पेंशन स्कीम के अलावा शायद ही कोई स्कीम हो जो इतने सालों बाद मैच्योर होती हो। लेकिन सरकार ने जानबूझकर लंबा lock-in period रखा है। क्योंकि इस स्कीम का मकसद ही रिटायरमेंट के लिए पैसा जुटाना है। लंबी अवधि होने की वजह से इसका पैसा गैरजरूरी चीजों पर खर्च नहीं होता है।

पीपीएफ की 15 साल की अवधि के दौरान आपको हर साल पैसा जमा करना होता है। वैसे अगर बीच में अगर आपको पैसे की जरूरत है तो आप पीपीएफ अकाउंट से लोन ले सकते हैं। इतना ही नहीं सात साल बाद आपको आंशिक निकासी की भी सुविधा मिल जाती है। लोन और आंशिक निकासी के नियमों के बारे में हम आगे आपको बताएंगे।

पीपीएफ खाते का अवधि विस्तार | PPF Account Extension

वैसे तो पीपीएफ खाता पन्द्रह साल में मैच्योर हो जाता है लेकिन सुकन्या स्कीम के तरह मैच्योरिटी के बाद पैसा निकालने की मजबूरी नहीं है। आप अपने खाते को अगले पांच साल के लिए फिर बढ़ा सकते हैं। ये वाले पांच साल खत्म हो जाए तो आगे आप फिर अपने खाते को पांच साल के ब्लॉक के लिए एक्सटेंड कर सकते हैं। ये सिलसिला पूरी उम्र चल सकता है।

पीपीएफ के एक्सटेंशन के दौरान भी आपको पहले की तरह ब्याज मिलता रहेगा। खाते में पांच साल का लॉक इन भी होगा लेकिन ये नए इन्वेस्टमेंट पर ही लागू होगा। पहले से जमा पैसे को आप बेझिझक निकाल सकते हैं।

वैसे आप चाहें तो बिना कोई नई रकम जमा किए भी पीपीएफ अकाउंट को आगे बढ़ाते रह सकते हैं। लेकिन टैक्स डिडक्शन का फायदा तभी मिलेगी जब आप अपने खाते को डिपॉजिट की शर्त के साथ आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में आपकी जमा रकम पर टैक्स छूट मिल जाएगी।

Maturiy  के बाद एक साल की अवधि पूरी होने के पहले ही Form H भरने पर आपको खाते की अवधि पांच साल की बढ़ाने की सुविधा मिल सकती है। इसके आगे भी आप अवधि बढ़वाना चाहें तो हर पांच साल बाद Form H भरना होगा।

लेकिन अगर आप कोई फॉर्म नहीं भरते हैं तो खाते को अपने आप एक्सटेंड कर दिया जाएगा। लेकिन आप उसमें कोई नया पैसा नहीं जमा कर सकेंगे।


पीपीएफ की ब्याज दर और इसकी गणना |
PPF Rate of interest

पीपीएफ सरकारी स्कीम है और सरकार इस पर दरियादिली से ब्याज देती है। और इसीलिए पीपीएफ पर मिलने वाली ब्याज दर बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट से काफी ज्यादा होती है। इस वक्त बैंक एफडी पर 6% से करीब इन्ट्रेस्ट रेट मिल रहा है। लेकिन वहीं पीपीएफ की ब्याज दर 7.1% है।

वैसे सरकार हर तीन महीने बाद पीपीएफ के ब्याज दर की समीक्षा करती है। लेकिन आमतौर कोशिश होती है कि इसके रेट को आकर्षक रखा जाए।

पीपीएफ खाते का इन्ट्रेस्ट कैलकुलेशन वित्त वर्ष के अंत में होता है। यानी हर साल इकतीस मार्च को ब्याज की गणना करके उसे आपके बैलेंस में जोड़ा जाता है। हालांकि ब्याज की गणना मासिक आधार पर होती है। देखा जाता है कि किसी महीने की पांच तारीख से लेकर आखिरी दिन के बीच खाते में न्यूनतम पैसा कितना था। उसी रकम पर ब्याज कैलकुलेट किया जाता है।

इसलिए अगर आप किसी महीने में पांच तारीख तक पैसा जमा कर देंगे उस जमा पर ब्याज उसी महीने मिल जाएगा। लेकिन पांच तारीख के बाद जमा करने पर ब्याज अगले महीने से जुड़ना शुरू होगा।

पीपीएफ स्कीम में टैक्स छूट
Tax exemption

पीपीएफ आपकी social security से जुड़ी scheme है और सरकार इसे बढ़ावा देना चाहती है। इसलिए, सरकार इस योजना पर कई तरह के tax benefit देती है।

जमा पर टैक्स छूट

सेक्शन 80C के तहत आप हर साल जितनी भी रकम पीपीएफ खाते में डालते हैं उतनी रकम आपके टैक्सेबल इनकम से घटा दी जाती है। इस तरह से पीपीएफ आपको tax deduction का फायदा देता है। इस नियम के तहत हर साल आप अधिकतम 1.5 लाख रुपए तक के जमा पर टैक्स छूट पा सकते हैं।

ब्याज पर टैक्स नहीं

पीपीएफ खाते में जमा रकम पर आप हर साल ब्याज पाते हैं। लेकिन इस ब्याज को आपकी सालाना Taxable Income में नहीं जोड़ा जाता है। यानी पीपीएफ पर मिलने वाला ब्याज टैक्स फ्री होता है। वहीं दूसरी तरफ फिक्स्ड डिपॉजिट का ब्याज टैक्सेबल होता है।

मैच्योरिटी की रकम टैक्स-फ्री

पीपीएफ खाता मैच्योर होने पर जब भी आप पैसा निकालते हैं वो भी पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। ये पैसा लाखों में हो सकता है। लेकिन इस पर टैक्स नहीं लगेगा।


पीपीएफ खाते पर रिटर्न
PPF gives returns above inflation

फिलहाल PPF पर सरकार 7.1% ब्याज दे रही है। ये interest rate अच्छा ही माना जाएगा। क्योंकि बैंक डिपॉजिट पर इससे कही कम ब्याज मिलता है। और इस ब्याज दर के चलते आप आसानी से महंगाई को मात दे सकते हैं।

2020 में ज्यादातर Government banks की लंबी अवधि की FD पर ब्याज 6 प्रतिशत से कम​ रहा। यहां भी पीपीएफ तुलनात्मक रूप से 1% ज्यादा return दे रहा है।

आप अपने PPF में जमा धनराशि के आधार पर bank या वित्तीय संस्थान से loan ले सकते हैं। ये आपको PPF पर मिल रहे ब्याज से सिर्फ 1% ज्यादा होगा।


कहां खुलवाया जा सकता है पीपीएफ एकाउंट?
Where Can One open a PPF Account??

पीपीएफ एकाउंट खोलने के लिए निम्न में से किसी भी विकल्प का चुनाव कर सकते हैं

  • आप PPF Account SBI में खुलवा सकते हैं। इसके सहयोगी बैंकों में भी सुविधा है।
  • कुछ Nationalised Banks की चुनिंदा शाखाओं में भी PPF Account खोलने की सुविधा उपलब्ध होती है
  • चुनिंदा Post Office में भी PPF Account खोले जा सकते हैं

पीपीएफ एकाउंट खोलने के लिए जरूरी डाक्यूमेंट

  • खाता खोलने का फॉर्म| Account Opening Form (Form 1)
  • पासपोर्ट साइज फोटोग्राफ| Passport size photograph
  • मान्य पहचान पत्र| ID proof: Copy of PAN card/ Voter ID/ Aadhaar ETC
  • निवास प्रमाण| Residence proof: Passport / Electrcity bill

Loading video

How many Account in a Family?
एक परिवार में कितने एकाउंट?

किसी एक बच्चे या minor के नाम पर दो guardian अलग-अलग account नहीं खोल सकते।
मान लिया आपके दो बच्चे हैं, तो आप सब लोग​ मिलकर maximum चार account खोल सकते हैं। दो पति और पत्नी के नाम, और दो दोनों बच्चों के नाम, guardian के रूप में।मान लिया आपने खुद के ​लिए और अपने दोनों बच्चों के लिए PPF Account खुलवा रखा है। ऐसी स्थिति में भी इन तीनों account में पीपीएफ के रूप में जमा राशि 1.5 लाख रुपए से ज्यादा नहीं होनी चा​हिए।

हिन्दू अविभक्त परिवार (HUF) के रूप में PPF Account अब नहीं खोला जा सकता। 13 मई 2005 से यह facility बंद कर दी गई है। लेकिन अगर आपका account  इसके पहले का है तो उनके लिए यह सुविधा maturity  होने तक चालू रहेगी। single account के साथ 5 साल के ब्लॉक में जो अवधि​ विस्तार करने की छूट खाताधारक को मिलती है, वह भी HUF खातों को नहीं मिल सकती।


पीपीएफ पर लोन |Loan against PPF Deposit

आप पीपीएफ से आसानी से लोन ले सकते हैं। इस अकाउंट से लोन लेने के कई फायदे हैं

  1. पीपीएफ लोन की ब्याज दर काफी कम होती है। आपको बस पीपीएफ का ब्याज दर से एक प्रतिशत ज्यादा ब्याज देना पड़ेगा
  2. खाता खुलवाने के बाद तीसरे साल से आप लोन ले सकते हैं।
  3. लोन लेने के लिए आपको कुछ गिरवी नहीं रखना पड़ेगा

पीपीएफ से लोन सस्ता तो पड़ता है लेकिन लोन की रकम काफी कम होती है। आपके PPF Account  में पिछले वित्तीय वर्ष में जो last balance रहा होगा, उसका 25 फीसदी ही loan के रूप में ले सकते हैं।

उदाहरण के लिए, आप अपने PPF Account के आधार पर july 2018 में लोन लेना चाहते हैं। आपके एकाउंट में march 2018 तक 80 हजार रुपए जमा हुए थे। ​

​नियमानुसार आपको पिछले वित्तीय वर्ष 2017-18 के अंतिम balance 80 हजार के आधार पर 20 हजार रुपए तक का लोन मिल सकता है। वर्ष 2018-19 के दौरान कभी भी आप loan के लिए apply करते हैं, तो इतनी ही मात्रा 20 हजार का ही loan आप ले पाएंगे।

पीपीएफ से लोन की शर्तें

  • आपके account में नियमित आधार पर हर वर्ष कम से कम 500 रुपए deposit होने चाहिए। ऐसा न होेने पर आपको loan नहीं मिल सकता। हां, अगर आपने penalty के साथ पिछले वर्ष का minimum amount 500 रुपए जमा करा दिया है तो फिर आप loan लेने के योग्य हो जाते हैं।
  • आप एक ही वर्ष में दो बार PPF  से लोन के लिए apply नहीं कर सकते।
  • जब तक आपका पिछला loan पूरा नहीं चुकता हो जाता, आप नए लोन के लिए apply नहीं कर सकते।
  • यहां तक कि अगर आपने किसी financial year के दौरान ​लोन तीन महीने में चुका दिया, तो भी उस वित्तीय वर्ष के खत्म होने तक आपको नया loan नहीं मिलेगा। उसके बाद फर आप अगले वित्तीय वर्ष में ही loan के लिए आवेदन करने योग्य हो सकेंगे।
  • PPF Loan  पर आपको आपके खाते में मिल रहे ब्याज से 1 प्रतिशत ज्यादा ब्याज अदा करना होगा। जैसे ​अभी आपको अपने account पर 7.1 फीसदी ब्याज मिल रहा है, तो आपके loan पर आपको 8.1 प्रतिशत ब्याज अदा करना होगा।
  • PPF  पर लिए गए loan की अदायगी भी आपको 36 months के अंदर कर देनी होती है। इसे आप एकमुश्त या installment में, जैसी आपकी सुविधा हो, कर सकते हैं। अगर आप इस अवधि में loan चुकता नहीं करते हैं, तो इसके बाद के financial year में आपको 2 की बजाय 6 % ब्याज लगेगा।

परिपक्वता अवधि के पहले खाता बंद करना हो तो…
Premature Closure of PPF Account

सामान्य स्थितियों मे 15 साल की maturity के पहले आप PPF Account बंद नहीं कर सकते। लेकिन emergency में इसे बंद करने की सुविधा आपको मिल सकती है। 18 जून 2016 को एक notification के माध्यम से भारत सरकार ने emergency में पीपीएफ एकाउंट से premature withdrawal को आसान बना दिया है। नए नियमों के मुताबिक आप इन स्थितियों में premature withdrawal कर सकते हैं।


मृत्यु होने पर

अगर account holder की मौत हो जाती है, तो उसका nominee या कानूनी वारिस एकाउंट बंद करने के लिए apply कर सकता है। ऐसी स्थिति में किसी भी तरीके का penalty उसे अदा नहीं करना होगा और उसका पूरा पैसा, पूरे ब्याज के साथ बिना किसी कटौती के उसे मिल जाएगा।

गंभीर बीमारी होने पर

account holder को स्वयं को, या अपने निकटतम संबंधियों में से किसी को किसी गंभीर ​बीमारी से इलाज की जरूरत हो। यहां निकटतम संबंधियों से आशय पति,पत्नी, बच्चे और माता-पिता से है। यहां इस बात का ध्यान रखें कि अगर आप medical ground पर premature withdrawal कर रहे हैं तो आपको सक्षम अधिकारी द्वारा प्रमाणित समुचित document दिखाने होंगे।

उच्च शिक्षा के लिए

Account holder  को स्वयं की या अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए भी premature account बंद करने की सहूलियत मिल सकती है। अगर higher education को कारण बनाया जा रहा है तो उसके लिए देश या विदेश में स्थित संस्था में admission का प्रमाण भी आपको दिखाना होगा। fees का बिल भी दिखाना होगा। medical या हायर एजुकेशन, दोनों ही स्थितियों में premature closing के लिए जरूरी है कि आपका account कम से कम पांच साल पुराना हो चुका हो। ऐसा न होने पर आप premature closing की सुविधा ​नहीं  ले सकते।

इस प्रकार की PPF premature closing  में आपकी जमा राशि पर मिलने वाले ब्याज की निर्धारित दर से 1 % कम ब्याज दिया जाएगा। ये penalty आपके शुरू से लेकर अंत तक deposit की गई पूरी धनराशि पर लगेगी।


VLOOKUP फ़ंक्शन क्या है:

VLOOKUP फ़ंक्शन क्या है:

VLOOKUP माइक्रोसॉफ़्ट एक्सेल में सबसे उपयोगी और महत्वपूर्ण फ़ंक्शन में से एक है। इसे आम तौर पर बड़े डेटा शीट में एक विशेष वैल्‍यू को देखने के लिए उपयोग किया जाता है जहां मैन्युअली सर्च करना बोझ हो सकता है।

VLOOKUP फ़ंक्शन approximate और exact मैच, और वाइल्डकार्ड (*?) को सपोर्ट करता हैं।

 

Meaning of VLOOKUP Function in Hindi:

“V” का अर्थ “vertical” है!

“Vertical” शब्द का अर्थ है कि इसका उपयोग वैल्‍यू को वर्टीकली देखने के लिए किया जा सकता है, इसलिए इसका उपयोग किसी कॉलम के भीतर वैल्‍यू को देखने के लिए किया जा सकता है।

 

Definition of Excel VLOOKUP in Hindi:

माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल के अनुसार VLOOKUP को एक फ़ंक्शन के रूप में डिफाइन किया जा सकता है, “जो टेबल के बाएं कॉलम में एक वैल्‍यू की तलाश करता है, और उसके बाद आपके द्वारा निर्दिष्ट कॉलम से उसी रो में वह वैल्‍यू रिटर्न करता हैं।

डिफ़ॉल्ट रूप से टेबल ascending ऑर्डर में सॉर्ट होना चाहिए।

VLOOKUP एक्सेल के सबसे उपयोगी फ़ंक्शन में से एक है, और इसलिए इसे समझना जरूरी है।

 

Syntax of VLOOKUP Function in Hindi:

VLOOKUP का सिंटेक्स चार तरह कि इनफॉर्मेशन से बनता हैं –

=VLOOKUP (value, table, col_index, [range_lookup])

 

इस सिंटेक्स में इस तरह से Arguments होते हैं –

value – टेबल के सबसे पहले कॉलम कि वैल्‍यू, जिसे खोजना हैं।

table – वह टेबल जिससे इस वैल्‍यू को प्राप्त करना हैं। (वह रेंज जिसमें वह वैल्‍यू मौजूद हैं)द  रखें कि lookup value हमेशा रेंज के पहले कॉलम में होनी चाहिए, ताकि वह सही ढंग से काम कर सके।

उदाहरण के लिए, यदि आपकी lookup value सेल C2 में है, तो आपकी रेंज C से शुरू होनी चाहिए।

col_index – टेबल या रेंज का वह कॉलम, जिससे वैल्‍यू को प्राप्त करना हैं।

इसमें दो ऑप्‍शन होते हैं जो वैकल्पिक हैं –

TRUE = Approximate Match और FALSE = Exact Match

यदि आप कुछ भी स्पेसिफाई नहीं करते, तो TRUE हि डिफ़ॉल्ट होगा।

इससे पहले कि हम यह जाने कि VLOOKUP का इस्‍तेमाल किस तरह से किया जाता हैं, हमें यह समझना चाहिए कि VLOOKUP फंक्शन कैसे कार्य करता है।

VLOOKUP को vertical rows टेबल में ऑर्गनाइज़ डेटा को रिट्रीव करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जहां प्रत्येक row एक नया रिकॉर्ड दर्शाती है।

यदि आपका डेटा horizontally ऑर्गनाइज़ है, तो HLOOKUP फ़ंक्शन का उपयोग करें।

 

How to Use Excel VLOOKUP in Hindi?

Excel VLOOKUP का उपयोग कैसे करें?

किसी वर्टिकल लुकअप फ़ंक्शन का उपयोग करने का तरीका समझने से पहले, हमें समझना चाहिए कि इसका उद्देश्य क्या है। एक सैंपल प्रॉब्‍लम के साथ इसे समझने की कोशिश करते हैं।

मान लीजिए कि हमारे पास एक टेबल है जैसा नीचे दिखाया गया है।

1-Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

अब VLOOKUP फ़ंक्शन का उपयोग करने के लिए इन तीन बातों को हमेशा ध्यान में रखें –

 

i) VLOOKUP Only Looks Right:

VLOOKUP केवल दाहिनी और देखता है

VLOOKUP को एक ऐसे टेबल की आवश्यकता होती है, जिसमें lookup values सबसे बाएं- कॉलम में हों।

जिस डेटा को आप रिट्रीव करना चाहते हैं (रिजल्‍ट वैल्‍यू), वह राइट के किसी भी कॉलम में दिखाई दे सकती हैं:

2-Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

 

ii) VLOOKUP Retrieves Data Based On Column Number:

जब आप VLOOKUP का उपयोग करते हैं, तो समझे कि टेबल के प्रत्‍येक कॉलम को बाएं (left) से नंबर दिया जाता हैं।

किसी विशेष कॉलम से वैल्‍यू को प्राप्त करने के लिए, बस “column index” में उचित कॉलम नंबर एंटर करें:

3-Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

=VLOOKUP(H2,B2:E8,2,FALSE)    // Name

=VLOOKUP(H2,B2:E8,3,FALSE)   // Dapartment

=VLOOKUP(H2,B2:E8,4,FALSE)   // Salary

 

iii) VLOOKUP has two matching modes, exact and approximate:

VLOOKUP में दो मोड हैं: matching: exact और approximate, जो कि चौथे argument द्वारा कंट्रोल किया जाता है, जिसे “range_lookup” कहा जाता है।

range_lookup को exact matching करने के लिए FALSE दे या approximate matching के लिए TRUE।

एक्सेल में TRUE वैल्‍यू को Approximate Match” और FALSE को “Exact Match” के रूप में डिस्क्राइब किया जाता हैं।

महत्वपूर्ण: range_lookup का डिफ़ॉल्ट TRUE होता है, इसलिए जब आप यहां पर कुछ भी नहीं एंटर करते हैं, तब डिफ़ॉल्ट रूप से TRUE का उपयोग किया जाएगा।

=VLOOKUP(value, table, column) // default, approximate match

=VLOOKUP(value, table, column, TRUE) // approximate match

=VLOOKUP(value, table, column, FALSE) // exact match

 

उदाहरण 1: Exact match

ज्यादातर मामलों में, आप निश्चित रूप से exact match मोड में VLOOKUP का उपयोग करना चाहेंगे। यह समझ में आता है जब आपके पास लुकअप वैल्‍यू के रूप में उपयोग करने के लिए एक युनिक key है, उदाहरण के लिए, इस डेटा में Company Name का टाइटल।

5-Exact match- Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

जैसा कि आप देख सकते हैं, City को सफलतापूर्वक फॉर्मूला सेल F4 में रिटर्न कर दिया गया।

यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि लुकअप वैल्यू, टेक्स्ट स्ट्रिंग “Apex Steel” लुकअप रेंज में मिलली चाहिए। Case (upper and lower) को छोड़कर, वैल्‍यू बिल्कुल अचूक मैच होनी चाहिए।

यदि आप “Apex  Steel” (दो स्‍पेस के साथ) टाइप करते हैं या “Apex Steel co” या “Apex comp” टाइप करते हैं, तो यह मैच नहीं होगा।

कोई भी एक्स्ट्रा spaces, abbreviations or characters नहीं। वे एक जैसे ही होने चाहिए। इसे exact match कहा जाता है।

 

Example 2: Approximate match:

जब आप TRUE (Approximate Match) को सिलेक्‍ट करते हैं तो आप Excel को उन वैल्‍यू को रिटर्न करने के लिए कहते हैं, जो एक दूसरे के लगभग समान हैं।

इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण स्टूडेंट के स्‍कोर के आधार पर ग्रेड ढूंढना हैं। इस मामले में आप VLOOKUP से दिए गए lookup value वैल्‍यू से बेस्‍ट मैच प्राप्‍त कर सकते हैं।

नीचे दिए गए उदाहरण में, D4 सेल का फार्मूला approximate match से सही ग्रेड प्राप्त करता है।

6-Approximate match- Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

=VLOOKUP(C4,F3:G8,2,TRUE)    //D4

=VLOOKUP(C5,F4:G9,2,TRUE)   //D5

 

नोट: जब आप VLOOKUP के approximate match मोड का उपयोग करते हैं तो आपके डेटा को लुकअप वैल्यू के ascending क्रम में सॉर्ट किया जाना चाहिए।

 

Example of VLOOKUP Function in Hindi:

अब हम असल में VLOOKUP का इस्‍तेमाल कैसे किया जाता हैं यह सिखेंगे। इसके लिए हम कंप्‍यूटर शॉप का एक उदाहरण लेते हैं, जिसमें कस्‍टमर को बिल दिया जाता हैं। हम इसके लिए प्रोडक्ट का एक डेटाबेस बनाएंगे, जिसके आइटम कोड को बिल में एंटर करने पर उस प्रोडक्ट का Description और Price अपने आप इनवॉइस में आ जाएगा, जिससे बिल बनाने में आसानी होगी।

सबसे पहले एक शीट में प्रोडक्ट डेटाबेस बनाते हैं।

7-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

आमतौर पर हर डेटाबेस में प्रत्येक आइटम के लिए कुछ युनिक आइडेंटिफायर होता हैं। इस डेटाबेस में, युनिक आइडेंटिफायर “Item Code” कॉलम में है।

आइए अब हम दूसरी शीट में एक सैम्‍पल इनवॉइस बनाते हैं –

8-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

अब इस इनवॉइस के “A” कॉलम में हम जैसे ही Item Code एंटर करेंगे, वैसे ही इस प्रोटक्‍ट का description और price दूसरी शीट के प्रोटक्‍ट डेटाबेस से रिट्रीव किया जाएगा।

सबसे पहले सेल A10 में सही आइटम कोड एंटर करें।

अब सेल B10 में फॉर्मूला एंटर करने के लिए Formulas टैब से Insert Function (fx) बटन पर क्लिक करें।

यहां VLOOKUP टाइप करें और फिर Go पर क्लिक करें।

अब फ़ंक्शन आर्ग्युमेंट्स बॉक्स प्रकट होगा, जिसमें हम VLOOKUP फ़ंक्शन को पूरा करने के लिए आवश्यक सभी arguments (या पैरामीटर) देंगे।

9-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

अब वैल्‍यू को इस प्रकार से सिलेक्‍ट करें –

i) Lookup-value-

फ़ंक्शन को यह बताना ज़रूरी है कि unique identifier को कहां पर ढूंढा जाए (इस मामले में आइटम कोड)। इसलिए हमने यहां पर जिस सेल में आइटम कोड एंटर किया हैं, उसे चुनना होगा (सेल A10 में)।

 

ii) Table_array-

दूसरे शब्दों में, हमें VLOOKUP को बताए जाने की जरूरत है कि डेटाबेस / लिस्‍ट को कहां खोजें। दूसरे argument के selector आइकॉन पर क्लिक करें।

अब डेटाबेस / लिस्‍ट को सिलेक्‍ट करें – जिसमें हेडर लाइन को शामिल न करें।

हमारे उदाहरण में, स्टॉक का डेटाबेस एक अलग वर्कशीट पर है, इसलिए हम उस वर्कशीट टैब पर पहले क्लिक करेंगे और फिर हम पूरे डेटाबेस को सिलेक्‍ट करेंगे। इसके बाद Enter कि प्रेस करें।

 

iii) Col_index_num –

हम इस argument का उपयोग VLOOKUP को डेटाबेस से  इनफॉर्मेशन के उस टुकड़े को स्पेसीफाइ करेंगे, जो A10 में हमारे आइटम कोड से संबद्ध है और जिसे हम रिटर्न चाहते हैं।

इस विशेष उदाहरण में, हम चाहते हैं कि आइटम का description इस सेल में आना चाहिए, तो हमारे प्रोडक्‍ट डेटाबेस में Description कॉलम का नंबर दो हैं। इसलिए हम Col_index_num बॉक्‍स में “2” वैल्‍यू एंटर करेंगे।

 

iv) Range_lookup –

अंत में, हमें यह तय करने की आवश्यकता है कि अंतिम VLOOKUP argument, Range_lookup में वैल्‍यू एंटर करनी या नहीं। यहां FALSE टाइप करें।

अब अंत में OK बटन पर क्लिक करें और देखें कि आइटम कोड “WD500” से संबंधित description को सेल B10 में सही एंटर हुआ है:

10-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

इसी तरह से आइटम की price को सेल D10 में रिटर्न करने के लिए हम ऐसे ही फॉर्मूला एंटर कर सकते हैं। ध्यान दें कि सेल D10 में नया फॉर्मूला बनाया जाना चाहिए। रिजल्‍ट ऐसा दिखेगा:

11-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi

ध्यान दें इस फॉर्मूला में Col_index_num नंबर “2” से बदलकर “3” बदल दिया गया हैं, क्‍योकि जिस price को हम रिट्रीव करना चाहते हैं, वह तीसरे कॉलम में हैं।

 

अब आप Total के लिए सेल E10 में इस तरह से फॉर्मूला टाइप कर सकते हैं

=C10*D10

तो इस तरह आपको कॉलम A में Item code और कॉलम C में Qty एंटर करनी हैं और बाकी इनफॉर्मेशन को आटोमेटिक एंटर किया जाएगा।

यदि आप इस पोस्‍ट से सच में VLOOKUP सीख गए हैं, तो आपके लिए एक टेस्‍ट हैं।

इस इनवॉइस के लिए अलग शीट में कस्‍टमर्स का एक डेटाबेस बनाएं और इनवॉइस के सेल E6 में customer ID एंटर करते हैं ही सेल B5, B6 और B7 में customer’s name और address आटोमेटिक आ जाने चाहिए।

12-Example of Excel VLOOKUP Fuction in Hindi


सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) में कैसे शुरू कर सकते हैं निवेश?

सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) में कैसे शुरू कर सकते हैं निवेश? कन्या समृद्धि योजना (SSY) बेटियों के लिए छोटी बचत योजना है. SSY को केंद्र सरकार...